भारत अपनी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) की रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। बुनियादी ढांचे के विस्तार में हो रही देरी के बीच अब सरकार सरकारी फंड के बजाय कमर्शियल स्टोरेज मॉडल अपनाएगी, ताकि प्राइवेट और इंटरनेशनल कंपनियों के साथ मिलकर एनर्जी सिक्योरिटी को मजबूत किया जा सके।
भारत अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को लेकर पुरानी सरकारी नीतियों को पीछे छोड़ते हुए अब एक लचीले कमर्शियल मॉडल की ओर बढ़ रहा है। वर्तमान में भारत के पास विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर में कुल 5.33 मिलियन टन की स्टोरेज क्षमता है। हालांकि, यह क्षमता देश की कुल खपत के मुकाबले महज 1 हफ्ते की जरूरत को ही पूरा कर पाती है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा क्रूड ऑयल आयात करता है, इसलिए भू-राजनीतिक तनावों के बीच यह बफर काफी कमजोर नजर आता है।
बुनियादी ढांचे के विस्तार में बाधा
साल 2018 में सरकार ने 6.5 मिलियन टन की अतिरिक्त क्षमता जोड़ने के लिए दूसरे चरण को मंजूरी दी थी, लेकिन प्रशासनिक अड़चनों के कारण यह योजना अभी भी सुस्त है। पादुर का विस्तार कार्य 2025 में कॉन्ट्रैक्ट स्टेज तक पहुंच सका है, जबकि चंडीखोल में प्रस्तावित 4 मिलियन टन का प्रोजेक्ट अभी भी शुरुआती योजना के दौर में है।
आंकड़ों पर गौर करें तो 2018 से 2024 के बीच मौजूदा स्टोरेज का इस्तेमाल महज 8.74% से 58.41% के बीच रहा है। इसका मतलब है कि जब क्रूड ऑयल की कीमतें कम थीं, तब भी भारत सरकारी फंड की कमी के चलते बड़े स्तर पर स्टॉक नहीं कर पाया।
कमर्शियल मॉडल से नई उम्मीद
अब सरकार पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप पर जोर दे रही है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण पादुर फैसिलिटी है, जहां भारत ने अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) जैसी इंटरनेशनल कंपनियों के साथ हाथ मिलाया है। इस मॉडल में कंपनियां अपना तेल भारतीय रिजर्व में स्टोर कर सकती हैं। भारत को इसमें 'राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल' मिलता है, यानी इमरजेंसी के वक्त भारत के पास वह तेल सबसे पहले खरीदने का हक होगा।
मई 2026 में UAE के साथ हुए फ्रेमवर्क के बाद अब भारत विदेशी स्टॉक को भी अपने इमरजेंसी बफर में गिनने लगा है। यह रणनीति सरकारी खजाने पर बोझ डाले बिना इमरजेंसी सप्लाई सुनिश्चित करने का एक स्मार्ट तरीका है। निवेशकों के लिए अब महत्वपूर्ण यह होगा कि सरकार कितनी तेजी से नई पार्टनरशिप फाइनल करती है और चंडीखोल प्रोजेक्ट की रफ्तार क्या रहती है।
