अगस्त 2026 में कतर से LNG सप्लाई पूरी तरह ठप होने के बाद भारत ने अब अपने सोर्स बदल लिए हैं। अब अमेरिका और नाइजीरिया प्रमुख सप्लायर बन गए हैं, लेकिन लंबी दूरी के कारण एनर्जी इंपोर्ट कॉस्ट बढ़ने से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है।
भारत ने अगस्त 2026 में कतर से एलएनजी (LNG) सप्लाई बंद होने के बाद अपनी प्रोक्योरमेंट स्ट्रैटेजी को पूरी तरह बदल दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) से होने वाला समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ है, जो ऊर्जा के लिए एक प्रमुख कॉरिडोर था।
सप्लाई गैप को भरने के लिए भारत ने अब दुनिया के दूसरे बाजारों का रुख किया है। अगस्त के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका अब भारत का सबसे बड़ा LNG सप्लायर बन गया है, जो कुल इंपोर्ट का करीब 35% हिस्सा है। इसके साथ ही नाइजीरिया और ओमान से भी सप्लाई बढ़ाई गई है, जिससे कुल मंथली इंपोर्ट 2.5 मिलियन टन के स्तर पर बना हुआ है।
सप्लाई में बदलाव और लॉजिस्टिक्स
कतर, जो कभी भारत की गैस जरूरतों का आधार था, उसने 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) घोषित कर दिया है। इसके चलते भारतीय कंपनियों को दूर-दराज के देशों से गैस मंगाना पड़ रहा है। अमेरिका से अगस्त में 859,000 टन और नाइजीरिया से करीब 541,000 टन LNG आयात की गई, जो पिछले महीने की तुलना में 84% ज्यादा है। खाड़ी देशों की तुलना में इन देशों से शिपमेंट आने में समय और फ्रेट खर्च दोनों ज्यादा लग रहे हैं।
सेक्टर पर क्या पड़ेगा असर?
पेट्रोनेट एलएनजी (Petronet LNG) पर इसका सबसे ज्यादा असर दिख रहा है, क्योंकि कंपनी के 56 कतर-बेस्ड कार्गो प्रभावित हुए हैं। मार्च से अगस्त 2026 के बीच भारत का एक्स्ट्रा फॉसिल-फ्यूल इंपोर्ट बिल $22 बिलियन तक पहुंच गया है।
निवेशकों को पावर और फर्टिलाइजर सेक्टर पर नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि गैस की बढ़ती कीमतें इन कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डाल सकती हैं। अगर कतर का फोर्स मेज्योर जारी रहता है, तो घरेलू बाजार ग्लोबल स्पॉट प्राइस की उतार-चढ़ाव के प्रति और अधिक संवेदनशील हो जाएगा। फिलहाल मार्केट की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या खाड़ी का यह रूट जल्द सामान्य हो पाएगा या नहीं।
