प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता का बड़ा लक्ष्य रखा है। साथ ही, उन्होंने ₹84,084 करोड़ की 'समुद्र मंथन' योजना की भी घोषणा की है, जिससे तेल और गैस की खोज के लिए 99% अपतटीय क्षेत्र खोल दिए जाएंगे।
भारत की नई ऊर्जा नीति: दो बड़े कदम
80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सरकार ने देश की ऊर्जा नीति में एक बड़ा फेरबदल किया है। इसका मुख्य मकसद ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता के बीच संतुलन बनाना है। इस नई नीति के दो प्रमुख स्तंभ हैं: परमाणु ऊर्जा क्षमता में भारी बढ़ोतरी और अपतटीय (offshore) क्षेत्रों में तेल व गैस की खोज के लिए बड़े पैमाने पर दरवाजे खोलना।
परमाणु ऊर्जा का विस्तार: 100 GW का लक्ष्य
सरकार ने साल 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस दिशा में पहला कदम उठाते हुए, चालू दशक में पांच नए परमाणु रिएक्टरों को चालू किया जाएगा। इस योजना का एक अहम कानूनी आधार 'शांति एक्ट, 2025' (SHANTI Act, 2025) है, जो परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी की अनुमति देता है। पहले यह क्षेत्र मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों के अधीन था। इस बदलाव से इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं, हालांकि सुरक्षा नियमों और लंबी प्रोजेक्ट समय-सीमाओं का ध्यान रखना होगा।
'समुद्र मंथन' योजना: तेल खोज में तेजी
कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम करने के लिए, सरकार ने ₹84,084 करोड़ की लागत वाली 'समुद्र मंथन' (राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना) शुरू की है। इस योजना के तहत, पहले 'नो-गो' (no-go) माने जाने वाले 99% अपतटीय क्षेत्रों को अन्वेषण के लिए खोल दिया जाएगा। सरकार को उम्मीद है कि इससे नए हाइड्रोकार्बन भंडार का पता चलेगा। इस योजना में वित्तीय प्रोत्साहन भी शामिल हैं, जहां सरकार कुछ क्षेत्रों में ड्रिलिंग लागत का 50% तक सब्सिडी के रूप में दे सकती है, ताकि शुरुआती जोखिम को कम किया जा सके।
निवेशकों के लिए संदर्भ और जोखिम
जहां एक ओर यह नीति घरेलू उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए है, वहीं निवेशकों को कुछ खास जोखिमों पर भी गौर करना चाहिए। अपतटीय अन्वेषण, खासकर गहरे पानी वाले क्षेत्रों में, बहुत अधिक पूंजी की मांग करता है और इसमें 'ड्राय होल' (यानी बिना तेल/गैस मिले) की संभावना भी अधिक होती है, जिससे भारी वित्तीय नुकसान हो सकता है। ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम करने वाली कंपनियों के पास मजबूत बैलेंस शीट होनी चाहिए ताकि वे बड़े पूंजीगत खर्चों का प्रबंधन कर सकें। निवेशकों को समय के साथ इन निवेशों के कर्ज के स्तर और रिटर्न अनुपात पर पड़ने वाले प्रभाव पर नजर रखनी चाहिए।
इसके अलावा, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र का विस्तार विशेष तकनीक और घटकों के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर बहुत अधिक निर्भर करता है। अंतरराष्ट्रीय साझेदारी या प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में किसी भी रुकावट से पांच रिएक्टरों की योजना में देरी हो सकती है। साथ ही, वैश्विक बाजार की अस्थिरता ऊर्जा की कीमतों को प्रभावित करती रहेगी, जिससे सरकारी सब्सिडी के बावजूद नई खोज परियोजनाओं की व्यावसायिक व्यवहार्यता पर असर पड़ सकता है।
निवेशकों को 'समुद्र मंथन' योजना से निकलने वाले विशिष्ट दिशानिर्देशों और निविदा प्रक्रियाओं के साथ-साथ 'शांति एक्ट' के कार्यान्वयन की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए। मुख्य निगरानी योग्य बिंदुओं में प्रोजेक्ट शुरू होने की समय-सीमा, परमाणु परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की वास्तविक भागीदारी का स्तर और प्रमुख ऊर्जा कंपनियों की पूंजी आवंटन रणनीतियां शामिल हैं।
