Green Hydrogen: भारत की बड़ी जीत! ₹90,000 करोड़ के सौदे पक्के, इन कंपनियों को होगा बड़ा फायदा

ENERGY
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
Green Hydrogen: भारत की बड़ी जीत! ₹90,000 करोड़ के सौदे पक्के, इन कंपनियों को होगा बड़ा फायदा

भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन के लिए सालाना **5.5 लाख मीट्रिक टन** के ऑफटेक समझौतों को अंतिम रूप दे दिया है, जिसमें **₹90,000 करोड़** का भारी निवेश शामिल है। यह बदलाव Reliance Industries और AM Green जैसी कंपनियों के लिए रेवेन्यू की स्पष्टता लाता है।

भारत के ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन में एक मील का पत्थर साबित हुआ है, जहां 23 घरेलू कंपनियों ने सालाना 5.5 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन के लिए ऑफटेक एग्रीमेंट साइन किए हैं। ऑफटेक एग्रीमेंट का सीधा मतलब यह है कि सामान बनने से पहले ही खरीदार ने उसे खरीदने की गारंटी दे दी है। ग्रीन हाइड्रोजन जैसे कैपिटल-इंटेन्सिव सेक्टर में यह डील कंपनियों को फिक्स्ड रेवेन्यू की गारंटी देती है, जिससे फंडिंग जुटाना और बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना आसान हो जाता है।

निवेश का बड़ा दांव और प्रमुख खिलाड़ी

इस पहल में कुल ₹90,000 करोड़ का निवेश प्रस्तावित है। Reliance Industries, AM Green और ACME Group जैसे दिग्गज इसमें आगे हैं। ये कंपनियां न केवल घरेलू मांग को पूरा कर रही हैं, बल्कि जर्मनी, जापान और यूरोप के देशों के साथ एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट्स भी कर रही हैं। फिलहाल ग्रीन अमोनिया का एक्सपोर्ट ज्यादा आसान है क्योंकि इसे स्टोर और ट्रांसपोर्ट करना प्योर हाइड्रोजन के मुकाबले कहीं ज्यादा सरल है।

सरकारी सपोर्ट और डिमांड

सरकार का SIGHT (Strategic Interventions for Green Hydrogen Transition) प्रोग्राम इस पूरे खेल का मुख्य ड्राइवर है, जिसके तहत ₹19,744 करोड़ का आवंटन किया गया है। इसका उद्देश्य ग्रीन हाइड्रोजन और फॉसिल-फ्यूल के बीच के लागत के अंतर को कम करना है। साथ ही, Indian Oil, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी तेल कंपनियां भी अपनी रिफाइनरी में इसे अपना रही हैं, जिससे घरेलू स्तर पर मांग को एक मजबूत आधार मिल रहा है।

निवेशकों के लिए चेतावनी (Investor Caution)

हालांकि कॉन्ट्रैक्ट्स का साइन होना पॉजिटिव है, लेकिन बिजनेस रिस्क बरकरार हैं। बड़े प्लांट्स लगाने का मतलब है भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर और शुरुआती सालों में उच्च कर्ज का दबाव। साथ ही, ग्लोबल मार्केट में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कंपनियों को अपनी उत्पादन लागत को अंतरराष्ट्रीय स्तर के बराबर लाना होगा।

निवेशकों को अब प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन, कर्ज प्रबंधन और ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि असली चुनौती अब इन बड़ी फैसिलिटीज को समय पर शुरू करने और मुनाफे को बनाए रखने की होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.