सरकार ने थर्मल पावर प्लांट्स के लिए विदेशी कोयले की अनिवार्य ब्लेंडिंग (Blending) को खत्म कर दिया है। अब पूरा फोकस घरेलू उत्पादन और Coal India की सप्लाई पर होगा, जिससे बिजली कंपनियों की लागत में कमी आने की उम्मीद है।
पावर कंपनियों के लिए राहत का मौका
बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों के लिए यह एक बड़ा नीतिगत बदलाव है। पहले विदेशी कोयले को घरेलू कोयले के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना अनिवार्य था, जिससे कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट (Operating Cost) काफी बढ़ गई थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले के ऊंचे दाम और उसे इंपोर्ट करने के बोझ का असर कंपनियों के मुनाफे पर पड़ रहा था। अब घरेलू कोयले के उपयोग से कंपनियों के मार्जिन में सुधार की उम्मीद है, बशर्ते उन्हें समय पर पर्याप्त घरेलू स्टॉक मिल सके।
Coal India पर बढ़ेगा दबाव
इंपोर्ट खत्म होने के बाद अब पूरा दारोमदार Coal India पर आ गया है। कंपनी को उत्पादन में तेजी लानी होगी ताकि विदेशी कोयले की कमी से पैदा होने वाले गैप को भरा जा सके। हालांकि इससे कंपनी की डिमांड तो बनी रहेगी, लेकिन उत्पादन में कोई भी देरी सीधे बिजली घरों में कोयले की कमी और पावर कट का कारण बन सकती है।
लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन का रिस्क
इस नई व्यवस्था में कोयले की ढुलाई सबसे बड़ा चैलेंज है। सरकार ने इंडियन रेलवे के माध्यम से कोयले के रैक की आवाजाही को प्राथमिकता दी है ताकि समय पर ईंधन प्लांट तक पहुंचे। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि क्या सप्लाई चेन में कोई अड़चन तो नहीं आ रही, क्योंकि किसी भी प्रकार का लॉजिस्टिक फेलियर ईंधन की किल्लत पैदा कर सकता है।
निवेशकों के लिए जरूरी बातें
आने वाले महीनों में निवेशकों को Coal India के मासिक उत्पादन आंकड़ों और पावर प्लांट्स के पास मौजूद कोयले के इन्वेंट्री स्तर पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। यही आंकड़े यह तय करेंगे कि यह कदम बिजली क्षेत्र की लागत कम करने में कितना सफल रहा है और ऊर्जा सुरक्षा पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है।
