साल 2025 में दो बड़े ऑफशोर विंड टेंडर रद्द होने के बाद भारत सरकार ने अब अपनी रणनीति बदल दी है। अब यूके (UK) और डच (Dutch) विशेषज्ञों के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को पटरी पर लाने की तैयारी है, ताकि **2030** तक **107 GW** की विंड क्षमता का लक्ष्य पूरा किया जा सके।
भारत के ऑफशोर विंड सेक्टर के लिए राह आसान नहीं दिख रही है। साल 2025 में तमिलनाडु के तट पर 4 GW और गुजरात के तट पर 500 MW के बड़े टेंडर रद्द करने पड़े क्योंकि डेवलपर्स की ओर से कोई भी बोली (bids) नहीं आई। अब Ministry of New and Renewable Energy ने इस पूरी प्रक्रिया को दोबारा डिजाइन करने के लिए यूके और नीदरलैंड के टेक्निकल एक्सपर्ट्स के साथ हाथ मिलाया है।
क्यों पीछे हट रहे हैं डेवलपर्स?
ऑफशोर विंड में निवेश की लागत ऑनशोर विंड के मुकाबले लगभग चार गुना ज्यादा है। भारी-भरकम शुरुआती खर्च (Upfront cost), स्पेशलाइज्ड पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और लंबे समय तक फाइनेंशियल सपोर्ट को लेकर अनिश्चितता ने प्राइवेट प्लेयर्स को दूर रखा है। जब तक मुनाफा दिखने का ठोस रास्ता नहीं मिलता, तब तक डेवलपर्स बड़े दांव लगाने से बच रहे हैं।
सरकार का अगला कदम
सरकार अब रिस्क कम करने पर जोर दे रही है। तमिलनाडु तट पर भूगर्भीय सर्वे (geophysical and geotechnical surveys) पूरे कर लिए गए हैं ताकि टर्बाइन लगाने वाली कंपनियों को साइट की स्थिति का साफ डेटा मिल सके।
निवेशकों के लिए संकेत
भारत का लक्ष्य अपनी विंड क्षमता को मौजूदा 58 GW से बढ़ाकर 107 GW तक ले जाना है। आने वाले समय में निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि सरकार नए टेंडर में किस तरह के फाइनेंशियल इंसेंटिव्स या इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट का ऐलान करती है। जब तक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क और बिजली टैरिफ में स्पष्टता नहीं आती, तब तक इस सेक्टर में सावधानी बरतना ही समझदारी है।
