सरकारी खजाने पर फोकस, एक्सपोर्टर्स पर नया शिकंजा
1 जून 2026 से, भारत सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के एक्सपोर्ट पर विंडफॉल टैक्स (Windfall Tax) के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। डीजल के एक्सपोर्ट पर अब ₹13.5 प्रति लीटर की स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) लगेगी, वहीं एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) पर ₹9.5 प्रति लीटर का टैक्स लगाया गया है। इतना ही नहीं, पेट्रोल के एक्सपोर्ट पर भी ₹1.5 प्रति लीटर का नया टैक्स लागू कर दिया गया है। इससे पहले इन उत्पादों पर टैक्स नहीं लग रहा था, लेकिन अब सरकार का मानना है कि ग्लोबल रिफाइनिंग मार्जिन (Refining Margins) काफी ज्यादा हो गया है।
सप्लाई रोकने की कोशिश और कंपनियों पर असर
सरकार की इस नई नीति का मुख्य मकसद सप्लाई की जमाखोरी को रोकना है। एक्सपोर्ट-ऑरिएंटेड शिपमेंट पर मुनाफा कम करके, सरकार कंपनियों को घरेलू बाजार में सप्लाई प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। अक्सर देखा गया है कि जब इंटरनेशनल क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतें बढ़ती हैं, तो रिफाइनरी कंपनियां 'क्रैक स्प्रेड्स' (Crack Spreads) यानी कच्चे माल की लागत और तैयार उत्पाद की बिक्री कीमत के अंतर से भारी मुनाफा कमाती हैं। ऐसे में सरकार उन पर टैक्स लगाती है। Reliance Industries जैसी बड़ी कंपनियों, जिनके पास घरेलू और एक्सपोर्ट दोनों के लिए रिफाइनिंग क्षमताएं हैं, के लिए यह एक चिंता का विषय है। अगर यह ड्यूटी SEZ (Special Economic Zone) के बाहर के वॉल्यूम पर लागू होती है, तो उनके ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (Gross Refining Margins) पर दबाव आ सकता है।
बाजार की चिंताएं और जोखिम
बाजार के प्रतिभागी इस हर दो हफ्ते में होने वाले रिव्यू प्रोसेस से जुड़ी अनिश्चितता से चिंतित हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि कौन सी रिफाइनरी संपत्ति विंडफॉल टैक्स के दायरे में आएगी, जिससे कंपनियों के वैल्यूएशन पर असर पड़ सकता है। जहां सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) सरकारी रेगुलेटेड कीमतों से स्थिर रहती हैं, वहीं इंडिपेंडेंट और प्राइवेट रिफाइनर्स को एक्सपोर्ट ड्यूटी के उतार-चढ़ाव और ग्लोबल कमोडिटी मार्केट की अस्थिरता का दोहरा जोखिम झेलना पड़ता है। साथ ही, सरकार इस रेवेन्यू का इस्तेमाल घरेलू महंगाई को कम करने के लिए एक्साइज ड्यूटी में कटौती की भरपाई के लिए कर रही है, जिससे यह एक 'रॉबिन हुड' जैसा रेगुलेटरी साइकिल बन गया है। ऐसे में, कंपनियों के मैनेजमेंट की पूंजी आवंटन क्षमता का मूल्यांकन, रेगुलेटरी दखलंदाजी के खतरे के मुकाबले किया जा रहा है।
आगे क्या?
विश्लेषक अभी सतर्क हैं। उनका मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतें स्थिर नहीं हो जातीं, सरकार इस टैक्स को फिस्कल बैलेंसिंग (Fiscal Balancing) के लिए एक लचीले टूल के रूप में इस्तेमाल करती रहेगी। हालांकि ONGC और Oil India Limited जैसी कंपनियों पर उनके अपस्ट्रीम प्रोडक्शन (Upstream Production) की लाभप्रदता को लेकर सवाल बने रहेंगे, लेकिन पूरे एनर्जी सेक्टर के अगले पॉलिसी रिव्यू तक सपाट रहने की उम्मीद है। मौजूदा मार्केट की राय यह है कि भले ही ग्लोबल डिमांड रिफाइनिंग क्रैक्स को सपोर्ट कर रही है, लेकिन इन ड्यूटीज की वजह से इस तिमाही में मार्जिन में बड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद कम है।
