भारत का रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर **300 GW** के ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंच गया है। हालांकि, ग्रिड की दिक्कतों और मैन्युफैक्चरिंग में ओवरसप्लाई के चलते अब निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। साल 2026 की शुरुआत में ही **8,000 GWh** से ज्यादा बिजली की कटौती हुई है, जो सीधे तौर पर डेवलपर्स के मार्जिन पर असर डाल रही है।
भारत ने जुलाई 2026 तक 300 GW की संचयी रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता हासिल करके एक बड़ा माइलस्टोन पार कर लिया है, जिसमें सोलर पावर का योगदान 164 GW से ज्यादा है। यह आंकड़े भले ही प्रभावशाली दिखें, लेकिन इनके पीछे छिपी परिचालन संबंधी चुनौतियां अब कंपनियों की फाइनेंशियल हेल्थ को बिगाड़ रही हैं।
ग्रिड की नाकामी और नुकसान
सबसे बड़ी समस्या बिजली बनाने की क्षमता और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच का अंतर है। राजस्थान जैसे रिन्यूएबल-रिच राज्यों से बिजली को सही तरीके से ग्रिड तक नहीं पहुंचाया जा पा रहा है, जिससे बिजली की बड़े पैमाने पर कटौती हो रही है। केवल 2026 की पहली तिमाही में 8,133 GWh सोलर पावर को ग्रिड से हटा दिया गया (curtailed), जो डेवलपर्स के लिए सीधे तौर पर भारी आर्थिक नुकसान है। अभी करीब 21 GW की क्षमता अस्थाई 'T-GNA' (Temporary General Network Access) पर निर्भर है, जिससे रेवेन्यू में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
मैन्युफैक्चरिंग में ओवरसप्लाई का संकट
दूसरी तरफ, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में समस्या ओवरसप्लाई की है। घरेलू सोलर मॉड्यूल की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़कर 210 GW हो गई है, जो घरेलू मांग से कहीं अधिक है। इस वजह से छोटे खिलाड़ी मार्केट से बाहर हो रहे हैं और बड़े मैन्युफैक्चरर्स के मार्जिन पर दबाव बढ़ गया है। हाई कमोडिटी लागत और सेल की कमी के कारण प्रोडक्शन खर्च ऊंचे बने हुए हैं, जिससे मुनाफा प्रभावित हो रहा है।
इंफ्रास्ट्रक्चर में पिछड़ती रफ्तार
पिछले 5 सालों में ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर अपने वार्षिक लक्ष्यों का केवल 80% ही हासिल कर पाया है। यह देरी बताती है कि चाहे कितने भी पावर प्लांट बन जाएं, उपभोक्ता तक बिजली पहुंचाने की क्षमता अभी भी कमजोर है। मौजूदा दौर में निवेशकों को ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और सरकारी ग्रिड मैनेजमेंट नीतियों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।
