Central Transmission Utility of India (CTUIL) ने बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के लिए नियमों को आसान कर दिया है। अब डेवलपर्स को स्टोरेज क्षमता बढ़ाने के लिए बार-बार ग्रिड अप्रूवल की जरूरत नहीं होगी, जिससे भारत की बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी।
नियमों में बड़ी राहत
अब बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स चलाने वाली कंपनियों को क्षमता विस्तार के लिए हर बार नए ग्रिड कनेक्शन के लिए आवेदन नहीं करना होगा। CTUIL के नए नियमों के तहत, डेवलपर्स अब प्रोजेक्ट्स की स्टोरेज ड्यूरेशन (MWh) को बिना किसी जटिल कानूनी प्रक्रिया के बढ़ा सकेंगे। यह प्रशासनिक बदलाव प्रोजेक्ट्स की स्केलिंग में आने वाली रुकावटों को पूरी तरह खत्म कर देगा।
ग्रिड स्टेबिलिटी और पीक डिमांड
भारत में बिजली की मांग रिकॉर्ड 269 GW के स्तर तक पहुँच चुकी है। ऐसे में सोलर पावर न होने के दौरान ग्रिड पर काफी दबाव बढ़ जाता है। भारतीय बिजली बाजार (IEX) में कीमतें अक्सर ₹20 प्रति kWh की ऊपरी सीमा तक पहुँच जाती हैं, जो ग्रिड की अस्थिरता को दर्शाती है। यह नया नियम BESS को सिर्फ एक बैकअप के बजाय ग्रिड स्टेबिलिटी के मुख्य हिस्से के रूप में स्थापित करेगा।
कंपनियों को क्या होगा फायदा?
Tata Power, JSW Energy और Adani Green Energy जैसी बड़ी कंपनियां अब बेहतर तरीके से 'एनर्जी आर्बिट्रेज' (Energy Arbitrage) का लाभ उठा सकेंगी। यानी दिन में सस्ती सोलर पावर स्टोर करके उसे पीक आवर्स में ऊंचे दामों पर बेचकर कंपनियां अपना मुनाफा बढ़ा सकती हैं।
हालांकि, इन्वेस्टर्स को यह ध्यान रखना होगा कि यह सेक्टर काफी कैपिटल-इंटेंसिव है। मुनाफा सीधे तौर पर पावर प्राइसेस की अस्थिरता और सही डिस्पैच साइकिल पर निर्भर करेगा। लंबी अवधि के स्टोरेज सिस्टम में मार्जिन कम हो सकते हैं, इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कंपनियां इन नई सुविधाओं का उपयोग कितनी तेजी से और कितनी सटीकता के साथ करती हैं।
