भारत ने Permanent Court of Arbitration के 1960 के सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को बरकरार रखने वाले फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। इस घटनाक्रम से जम्मू-कश्मीर में चल रहे प्रमुख हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के लिए रेगुलेटरी अनिश्चितता पैदा हो गई है।
फैसले का आधार और भारत का रुख
हेग स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) ने 31 अगस्त, 2026 को यह फैसला सुनाया था कि 1960 का सिंधु जल समझौता पूरी तरह से प्रभावी है और अप्रैल 2025 में भारत द्वारा इसे सस्पेंड करने का फैसला कानूनी रूप से सही नहीं है। अदालत ने विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में 'रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट' को लेकर अंतरिम उपाय भी सुझाए हैं। भारत सरकार ने इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए कहा है कि यह ट्रिब्यूनल गलत तरीके से गठित किया गया था और उसे देश के संप्रभु जल प्रबंधन निर्णयों पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है।
पावर इंफ्रास्ट्रक्चर पर क्या है असर?
यह विवाद मुख्य रूप से चिनाब बेसिन (Chenab Basin) में पानी के उपयोग को लेकर है, जहां कई महत्वपूर्ण पावर प्रोजेक्ट्स का काम चल रहा है। इसमें 'रतले', 'पक्कल दुल' और 'क्वार' जैसी परियोजनाएं शामिल हैं, जो क्षेत्र के ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए रीढ़ की हड्डी हैं। NHPC Limited, जो इन परियोजनाओं में मुख्य भूमिका निभाती है, अब एक ऐसे कानूनी माहौल में काम कर रही है जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनी अनिश्चितता का साया है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इन प्रोजेक्ट्स के कंस्ट्रक्शन टाइमलाइन में देरी का जोखिम बना हुआ है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंडे को जारी रखेगी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवाद के चलते फाइनेंसिंग और इंश्योरेंस जैसे क्षेत्रों में जटिलताएं बढ़ सकती हैं। निवेशकों को अब Ministry of Power और Ministry of External Affairs की ओर से आने वाली आधिकारिक अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए। पावर सेक्टर के जानकारों का मानना है कि इस कूटनीतिक गतिरोध का असर प्रोजेक्ट की कमीशनिंग डेट्स पर पड़ सकता है, जिससे लागत बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
