भारतीय तेल रिफाइनरियों ने सितंबर और अक्टूबर के लिए तेल का इंतजाम कर लिया है, लेकिन नवंबर के लिए स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। मिडिल ईस्ट में तनाव और अमेरिकी टैरिफ के डर से लागत बढ़ रही है और क्रूड इन्वेंट्री निचले स्तर पर है।
भारत की तेल रिफाइनरियां एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही हैं। हालांकि सितंबर और अक्टूबर तक की जरूरतें पूरी कर ली गई हैं, लेकिन नवंबर से आगे की राह मुश्किल दिख रही है। इसकी मुख्य वजह मिडिल ईस्ट में इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतें और अमेरिकी सरकार द्वारा प्रस्तावित नए कड़े कानून हैं।
बढ़ती लागत और मार्जिन पर दबाव
क्रूड की आयात लागत लगातार बढ़ रही है। सितंबर के मध्य तक 'इंडियन क्रूड ऑयल बास्केट' $128.70 प्रति बैरल तक पहुंच गई है। कच्चे तेल की कीमतों के अलावा, माल ढुलाई (freight), बीमा और वॉर-रिस्क प्रीमियम के खर्च भी बढ़ गए हैं, जिससे रिफाइनिंग मार्जिन पर तगड़ा दबाव है।
इन्वेंट्री का संकट
देश में क्रूड इन्वेंट्री घटकर 93.5 मिलियन बैरल रह गई है, जो मई के बाद का सबसे निचला स्तर है। यह स्टॉक केवल 20 दिन की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ड्रोन हमलों के कारण भारत को होने वाली 400,000 बैरल की दैनिक आपूर्ति भी प्रभावित हुई है।
अमेरिका का नया कानून
चिंता का एक और बड़ा कारण 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026' है। यदि यह कानून लागू होता है, तो रूसी तेल का व्यापार जारी रखने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है। भारत अब अमेरिका और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों से तेल मंगवाकर विकल्प तलाश रहा है, लेकिन पुराने रूट के बंद होने या वैकल्पिक स्रोतों की लागत बढ़ने से फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर असर पड़ सकता है।
जैसे-जैसे भारत अपनी रिफाइनिंग क्षमता बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे कच्चे तेल की मांग भी तेज हो रही है। अब निवेशकों की नजर सऊदी पाइपलाइन की बहाली और अमेरिकी कानूनों के अंतिम स्वरूप पर टिकी है।
