ईरान के नए मैरीटाइम अथॉरिटी ने **45** जहाजों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है, जिसमें भारत के दो जहाज भी शामिल हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सुरक्षा चिंताओं के कारण भारतीय रिफाइनर्स इन जहाजों से दूरी बना रहे हैं, जिससे एनर्जी लॉजिस्टिक्स और शिपिंग कॉस्ट पर बुरा असर पड़ सकता है।
संकट की वजह और जोखिम
ईरान की नवनिर्मित पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी ने 45 समुद्री जहाजों को ब्लैकलिस्ट किया है, जिनमें भारत का LNG टैंकर 'Disha' और बल्क कैरियर 'Maha Roos' भी शामिल हैं। तेहरान का आरोप है कि इन जहाजों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य में ट्रांजिट प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि नियम न मानने वाले जहाजों को भारी जुर्माना, डिटेंशन या कार्गो जब्ती का सामना करना पड़ सकता है।
रिफाइनर्स की बढ़ती मुसीबत
भारतीय रिफाइनर्स अब अपने शिपिंग पार्टनर्स की बारीकी से जांच कर रहे हैं ताकि वे क्षेत्रीय समुद्री तनाव में न फंसें। रिस्क को कम करने के लिए अब कंपनियां 'डिलीवर्ड-बेसिस' (delivered-basis) परचेजिंग एग्रीमेंट्स की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि, यह कदम रिफाइनर्स को तो सुरक्षित रखता है, लेकिन इससे फ्रेट कॉस्ट में भारी इजाफा हो सकता है, क्योंकि सप्लायर्स इसमें बढ़े हुए इंश्योरेंस प्रीमियम और रिस्क को जोड़ देते हैं।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर असर
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि सऊदी अरामको (Saudi Aramco) और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए भी लॉजिस्टिक्स मुश्किल हो गई है। जहाजों की सीमित संख्या के कारण माल ढुलाई महंगी होने की पूरी संभावना है। निवेशकों को यह नजर रखनी चाहिए कि क्या कंपनियां अपनी इंपोर्ट एफिशिएंसी बनाए रख पाएंगी, या फिर बढ़ते इंश्योरेंस खर्च से आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ेगा।
