भारत अब लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) रीगैसिफिकेशन क्षमता के मामले में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा बाज़ार बन गया है। 2025 तक, देश की कुल क्षमता **52.5 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA)** तक पहुँच गई है। हालाँकि, इंफ्रास्ट्रक्चर तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन नए टर्मिनलों के जुड़ने और गर्मियों में इम्पोर्ट में आई कमी के चलते **2025** में यूटिलाइजेशन रेट घटकर **47%** पर आ गया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर में तेज़ रफ़्तार, लेकिन यूटिलाइजेशन पर दबाव
अंतर्राष्ट्रीय गैस यूनियन (International Gas Union) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, भारत 52.5 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) की LNG रीगैसिफिकेशन क्षमता के साथ दुनिया में चौथे स्थान पर आ गया है। इसने भारत को स्पेन से आगे बढ़ा दिया है, और अब यह केवल जापान, चीन और दक्षिण कोरिया से पीछे है।
इस विस्तार में गुजरात का दहेज LNG टर्मिनल एक अहम भूमिका निभा रहा है, जिसकी क्षमता 17.5 MTPA है। यह दुनिया का छठा सबसे बड़ा टर्मिनल है और भारत का एकमात्र अल्ट्रा-लार्ज रीगैसिफिकेशन हब बना हुआ है। इसके अलावा, देश में 5 MTPA क्षमता वाले सात अन्य बड़े टर्मिनल भी मौजूद हैं।
2025 में नए छारा LNG टर्मिनल के चालू होने और दभोल सुविधा के विस्तार से क्षमता में और वृद्धि हुई है। दभोल प्रोजेक्ट में ब्रेकवाटर इंफ्रास्ट्रक्चर जोड़ा गया है, जिससे अब यह मानसून के दौरान भी साल भर चालू रह सकता है।
क्षमता के इस्तेमाल में गिरावट का कारण?
जहाँ एक ओर इंफ्रास्ट्रक्चर का तेज़ी से विकास हुआ है, वहीं दूसरी ओर इन सुविधाओं के वास्तविक उपयोग पर दबाव देखा जा रहा है। उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में यूटिलाइजेशन रेट घटकर लगभग 47% रह गया, जो पिछले साल 58% था। इस गिरावट के मुख्य कारण गर्मियों के महीनों में LNG इम्पोर्ट में आई कमी और नई क्षमता का जुड़ना है, जिसकी मांग अभी पूरी तरह से बाज़ार में नहीं आई है।
निवेशकों के लिए, यह स्थिति इंफ्रास्ट्रक्चर में हुए निवेश और बाज़ार की वर्तमान मांग के बीच एक अंतर को दर्शाती है। मांग में वृद्धि के बिना बढ़ी हुई क्षमता टर्मिनल ऑपरेटरों की कार्यकुशलता को प्रभावित कर सकती है।
भविष्य की योजनाएं और रणनीतिक दृष्टिकोण
उद्योग में आगे भी विकास की योजनाएं जारी हैं। वर्तमान में चार अतिरिक्त प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, जिनमें एक नया टर्मिनल और तीन विस्तार परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें दहेज सुविधा का और विस्तार भी शामिल है। इन प्रोजेक्ट्स से 2028 तक भारत की कुल क्षमता में 11.3 MTPA और जुड़ने की उम्मीद है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की जटिलताओं, जैसे कि मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव, से निपटना एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी रहेगी। स्पॉट मार्केट और विभिन्न स्रोतों से सोर्सिंग पर बढ़ती निर्भरता ने स्थिरता बनाए रखने में मदद की है, लेकिन उद्योग वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। आगे चलकर, निवेशक इस बात पर नज़र रखेंगे कि क्या घरेलू मांग इन महंगी, दीर्घकालिक पूंजी संपत्तियों के यूटिलाइजेशन रेट को बेहतर बनाने के लिए पर्याप्त तेज़ी से बढ़ती है।
