भारत की एनर्जी पर बड़ा दांव
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि की है कि भारत को कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई में भारी बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा कि पारदर्शी डेटा इस बढ़ते व्यापार की गवाही दे रहा है। यह पुष्टि ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया (West Asia) में भू-राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी हुई है, जिससे ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन (Global Energy Supply Chain) पर असर पड़ा है। भारत अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए सस्ते ईंधन की तलाश में है, और यह डील राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देती है।
मिडिल ईस्ट संकट ने बढ़ाई रूसी तेल की मांग
मिडिल ईस्ट में चल रहा तनाव, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आई रुकावटों ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट्स को बड़ा झटका दिया है। भारत के दैनिक कच्चे तेल आयात (Crude Oil Imports) का करीब 52% हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है, इसलिए यहाँ की अस्थिरता सीधे तौर पर देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा है। इस भेद्यता (Vulnerability) के चलते भारत ने विकल्प तलाशे, और रूसी क्रूड (Russian Crude) एक महत्वपूर्ण बफर साबित हुआ। मार्च 2026 में, भारतीय क्रूड ऑयल इम्पोर्ट्स में 13% की गिरावट आई, जिसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया से हुई शिपमेंट्स में 61% की भारी कमी थी। रूस ने तुरंत जवाब देते हुए भारत को अपनी सप्लाई लगभग दोगुनी कर दी, जो 2.25 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) तक पहुँच गई। इससे रूस एक बार फिर भारत का टॉप ऑयल सप्लायर बन गया। अमेरिकी प्रतिबंधों में मिली छूट (Sanctions Waivers) भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई, जिसने ऊर्जा लागत में अनुमानित $12 बिलियन की वृद्धि को रोका। मई 2026 में रूसी तेल का औसत आयात 1.9 मिलियन bpd रहा, जबकि दैनिक शिपमेंट 2.3 मिलियन बैरल तक पहुँच गई।
'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' से तय हो रही एनर्जी की राह
रूस से तेल आयात पर भारत का यह मजबूत रुख उसकी 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' (Strategic Autonomy) की लंबी नीति का स्पष्ट उदाहरण है। 2022 से पहले, रूस भारत के लिए एक छोटा सप्लायर था, लेकिन 2025 के मध्य तक, यह भारत के कुल आयातित क्रूड का 40% से अधिक हो गया था। अमेरिकी दबाव के बावजूद, नई दिल्ली ने लगातार अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दी है। यह रणनीति तब और स्पष्ट हुई जब 2026 की शुरुआत में रूसी खरीद कम करने वाले भारतीय रिफाइनर्स ने अब मिडिल ईस्ट संकट और अमेरिकी छूट के कारण इस ट्रेंड को उलट दिया है। यह लचीलापन उन अन्य देशों के विपरीत है जो सख्त प्रतिबंधों का पालन करते हैं। भारत के आयात में पारंपरिक मध्य पूर्वी सप्लायर्स, जिसमें OPEC देश भी शामिल हैं, की हिस्सेदारी मार्च 2026 में ऐतिहासिक रूप से घटकर लगभग 29% रह गई थी, जिसका सीधा कारण होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी थी। अमेरिका एक महत्वपूर्ण नॉन-OPEC सप्लायर के रूप में उभर रहा है, जबकि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका भी सोर्सिंग के महत्वपूर्ण क्षेत्र बन रहे हैं। वहीं, BRICS देश अपनी एनर्जी सिक्योरिटी और ट्रेड को मजबूत करने के लिए सहयोग बढ़ा रहे हैं।
रूसी तेल पर निर्भरता के जोखिम
हालांकि, सस्ते रूसी क्रूड पर भारत की बढ़ती निर्भरता तत्काल आर्थिक लाभ तो दे रही है, लेकिन इसके गंभीर जोखिम भी हैं। रूसी तेल पर निर्भरता, जो अक्सर प्रतिबंधों के तहत काम करने वाले 'शैडो' टैंकरों (Shadow Tankers) के माध्यम से आता है, अनुपालन (Compliance) को लेकर अनिश्चितता पैदा करती है। जैसे-जैसे वैश्विक मांग बढ़ेगी और रूस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव जारी रहेगा, मॉस्को भारतीय खरीदारों को कम छूट दे सकता है। अमेरिका का प्रतिबंध छूट पर रुख बदलना, जो बाजार की स्थिरता और रूस पर दबाव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है, एक नाजुक माहौल बनाता है। वाशिंगटन ने बार-बार भारत से इन खरीदों को कम करने का आग्रह किया है, और किसी भी नीतिगत बदलाव से व्यापार पर महत्वपूर्ण दंड लग सकता है। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट संकट का लंबा खिंचना वैश्विक तेल कीमतों में अस्थिरता को बढ़ा सकता है, जिससे भारत की आयात लागत बढ़ सकती है और घरेलू मुद्रास्फीति (Inflation) को बढ़ावा मिल सकता है, भले ही वर्तमान आपूर्ति प्रयास जारी हों। इस विशिष्ट रियायती तेल पर निर्भरता, जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों के साथ मिलकर, भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक नाजुक संतुलन बनाती है।
ऊर्जा सुरक्षा बनाम भू-राजनीति: भारत का संतुलन
भारत की ऊर्जा खरीद रणनीति आर्थिक आवश्यकता और भू-राजनीतिक दांव-पेच का एक जटिल मिश्रण बनी रहेगी। BRICS देशों के ऊर्जा मंत्रियों के 2025-2030 रोडमैप में उल्लिखित अनुसार, एनर्जी सहयोग और सुरक्षा को मजबूत करना सदस्य देशों का एक मुख्य उद्देश्य है। रूसी तेल आयात के लिए अमेरिकी छूट (Waivers) को जारी रखना, भारत की तत्काल ऊर्जा जरूरतों और महंगाई (Inflationary Pressures) को प्रबंधित करने के लिए महत्वपूर्ण होगा। हालांकि, इस रणनीति की दीर्घकालिक सफलता आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने और रूस व पश्चिमी भागीदारों के साथ संबंधों को सावधानीपूर्वक प्रबंधित करने पर निर्भर करती है।