बढ़ती बिजली की मांग और सप्लाई के बीच सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने **2035** के लिए कोयला आधारित पावर कैपेसिटी का लक्ष्य **97 GW** से बढ़ाकर **150 GW** कर दिया है।
भारत अपनी एनर्जी स्ट्रेटजी में बड़ा बदलाव कर रहा है। बिजली की रिकॉर्ड मांग से निपटने के लिए सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने कोल-फायर्ड पावर कैपेसिटी का नया लक्ष्य 150 GW निर्धारित किया है, जो पहले 97 GW था। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह देश में बिजली की मांग में भारी उछाल है। जुलाई 2026 में भारत की पीक पावर डिमांड रिकॉर्ड 270 GW के स्तर पर पहुंच गई थी, जो पिछले साल के मुकाबले 45 GW से 50 GW ज्यादा है।
क्यों बदली गई रणनीति?
भले ही भारत रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम कर रहा है, लेकिन ग्रिड स्टेबल रखने के लिए 'बेसलोड' पावर की जरूरत है। खराब मानसून की वजह से हाइड्रोपावर जनरेशन में 20% की गिरावट आई है, जिससे थर्मल पावर प्लांट की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। कोयला ही अब ब्लैकआउट को रोकने का इकलौता भरोसेमंद जरिया बन गया है।
इंडस्ट्रियल कैप्टिव प्लांट्स पर असर
सितंबर 2026 में पावर सप्लाई गैप 56 करोड़ यूनिट (किलोवाट-घंटे) तक पहुंच गया था। इसे देखते हुए पावर मिनिस्ट्री ने Vedanta, JSW Steel, Hindalco और UltraTech जैसी बड़ी कंपनियों के 100 से ज्यादा कैप्टिव पावर प्लांट्स को दिसंबर 2026 तक फुल कैपेसिटी पर चलाने का आदेश दिया है। निवेशकों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, क्योंकि फुल कैपेसिटी पर प्लांट चलाने से फ्यूल कॉस्ट बढ़ सकती है और ऑपरेशनल मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
रिस्क और मार्केट पर नजर
कोयला निर्भरता बढ़ने से DISCOMs पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा, क्योंकि पीक शॉर्टेज के समय महंगी बिजली खरीदना उनकी बैलेंस शीट बिगाड़ सकता है। साथ ही, कोल सप्लाई चेन और रेल रेक्स (Rail Rakes) की लॉजिस्टिक्स चुनौतियां भी बनी हुई हैं। निवेशकों को अब पावर प्रोड्यूसर्स और हैवी इंडस्ट्रीज के तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए कि क्या ये सरकारी आदेश उनके मुनाफे को कम कर रहे हैं।
