भारत का यह फैसला देश के ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव (energy transition) की राह में आ रही बड़ी मुश्किलों को दिखाता है। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की 'फ्लेक्सिबिलिटी' बढ़ाने की योजना को एक साल के लिए टाल दिया गया है। यह विलंब, नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) को ग्रिड में बेहतर ढंग से शामिल करने और पारंपरिक थर्मल पावर पर निर्भरता के बीच के टकराव को उजागर करता है।
असल में, समस्या की जड़ यह है कि कोयला संयंत्रों के न्यूनतम संचालन भार (minimum operational load) को 55% से घटाकर 40% करने के प्रस्ताव पर सहमति नहीं बन पा रही है। इसके लिए संयंत्रों में बड़े पैमाने पर तकनीकी बदलाव (retrofitting) करने होंगे। सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि इन अतिरिक्त रखरखाव और बदलाव की लागत का भुगतान कैसे किया जाएगा।
इस देरी का सीधा असर यह होगा कि ग्रिड बढ़ती सौर ऊर्जा उत्पादन को कुशलता से संभाल नहीं पाएगा। नतीजतन, सौर ऊर्जा को काटना (curtail) पड़ सकता है, जिससे सौर उत्पादकों को 7.6 करोड़ डॉलर (लगभग 630 करोड़ रुपये) तक के मुआवजे का दावा करना पड़ सकता है। इससे ग्रिड की परिचालन दक्षता पर दबाव बढ़ेगा और अंततः यह बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में झलक सकती है।
चीन जैसे देश पहले ही कोयला संयंत्रों के उपयोग को काफी कम कर चुके हैं। भारत में, ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण 50 GW से अधिक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को ग्रिड से जोड़ा नहीं जा सका है। ऐसे में, सोलर पावर का उत्पादन ₹4.28 प्रति यूनिट पर 24 घंटे बिजली दे सकता है, जो कोयले से बिजली की ₹6 प्रति यूनिट लागत से कहीं सस्ता है। हालांकि, कोयला संयंत्रों के रेट्रोफिटिंग से टैरिफ में केवल ₹0.28-₹0.60 प्रति kWh की बढ़ोतरी का अनुमान है, जो बैटरी स्टोरेज की ₹5.76-₹6.04 प्रति kWh की तुलना में कम लगता है।
इस देरी से ग्रीन इन्वेस्टमेंट (green investment) पर भी जोखिम बढ़ गया है। यदि नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रिड में समाहित नहीं किया जा सका, तो यह निवेश बर्बाद हो सकता है। NTPC लिमिटेड ने आगाह किया है कि कम लोड पर संयंत्र चलाने से उपकरणों में टूट-फूट तेज हो सकती है, जिससे उनकी उम्र एक तिहाई तक कम हो सकती है।
भारत की ऊर्जा नीति का लक्ष्य 2035 तक 307 GW कोयला क्षमता और 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन (non-fossil fuel) क्षमता हासिल करना है। इस बीच, Tata Power के मुंद्रा जैसे संयंत्रों को भी पहले ऐसे ही निर्देशों का सामना करना पड़ा है। लागत विवाद को सुलझाना और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करना, नवीकरणीय ऊर्जा को प्रभावी ढंग से एकीकृत करने के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं।