सरकार ने एयरलाइंस के लिए एक नई ड्राफ्ट पॉलिसी पेश की है, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भरने वाली एयरलाइंस को अपनी सालाना जरूरत का 90% फ्यूल भारतीय हवाई अड्डों से ही खरीदना होगा। इसके अलावा, 2027 से सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के इस्तेमाल का लक्ष्य भी तय किया गया है, जिससे कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकती है।
नियम क्यों लाया गया?
नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा पेश की गई 'नेशनल सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल पॉलिसी 2026' का मुख्य उद्देश्य 'इकोनॉमिक टैंकरिंग' (Economic Tankering) को रोकना है। अभी कई एयरलाइंस विदेशों से सस्ता फ्यूल भरवाकर आती हैं ताकि भारत में महंगे एटीएफ (ATF) की खरीदारी से बच सकें। इस नए नियम से घरेलू बाजार में फ्यूल की मांग बढ़ेगी और SAF सेक्टर को भी बढ़ावा मिलेगा।
एयरलाइंस पर दबाव और बढ़ेगा खर्च
IndiGo और Air India जैसी भारतीय एयरलाइंस पहले से ही महंगे फ्यूल, कमजोर रुपये और ग्लोबल अनिश्चितताओं से जूझ रही हैं। अनुमान है कि मौजूदा फाइनेंशियल ईयर में भारतीय एयरलाइंस को कुल ₹38,000 करोड़ का नुकसान हो सकता है। ऐसे में फ्यूल खरीदारी पर पाबंदी उनके मुनाफे के मार्जिन पर गहरा असर डाल सकती है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या कंपनियां इस बढ़े हुए खर्च का बोझ यात्रियों पर डालेंगी या खुद सहन करेंगी।
SAF ब्लेंडिंग का रोडमैप
पॉलिसी के मुताबिक, 1 जनवरी 2027 से 1% SAF ब्लेंडिंग अनिवार्य होगी। इसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 2028 में 2%, 2029 में 3%, 2030 में 5% और 2040 तक 20% करने का लक्ष्य है। हालांकि सरकार टैक्स में छूट और वायबिलिटी गैप फंडिंग जैसे प्रोत्साहन देने का वादा कर रही है, लेकिन SAF की उपलब्धता और उसकी कीमत अभी भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है।
निगरानी और अनुपालन
DGCA इस पूरे प्रोसेस के लिए एक नेशनल रजिस्ट्री बनाएगा। एयरलाइंस को हर एयरपोर्ट पर अपने फ्यूल अपलिफ्ट की रिपोर्ट देनी होगी। नियमों का पालन न करने पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान हो सकता है। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां इस ट्रांजिशन को कितनी कुशलता से संभालती हैं और सरकारी इंसेंटिव्स का फायदा उन्हें कब तक मिलता है।
