सितंबर 2026 में रिन्यूएबल और हाइड्रो एनर्जी की प्रोडक्शन में कमी के चलते भारत की कोयले पर निर्भरता बढ़कर **64.86%** पहुंच गई है। पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक गिरकर जरूरत का मात्र **36%** रह गया है, जिससे सप्लाई चेन पर भारी संकट मंडरा रहा है।
थर्मल पावर पर बढ़ा बोझ
भारत के एनर्जी सेक्टर में इस समय बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। सितंबर 2026 में कोयले से बनने वाली बिजली का आंकड़ा 64.86% तक पहुंच गया है, जो अगस्त में 63.17% था। दरअसल, पीक डिमांड 45-50 GW तक पहुंचने के बावजूद हाइड्रो और रिन्यूएबल एनर्जी की सप्लाई उम्मीद के मुताबिक नहीं रही।
डेटा पर नजर डालें तो हाइड्रो पावर जनरेशन में सालाना आधार पर 20% की बड़ी गिरावट आई है, वहीं रिन्यूएबल एनर्जी में महीने-दर-महीने 16% की कमी दर्ज की गई है। इस अस्थिरता ने साबित कर दिया है कि रिन्यूएबल एनर्जी का मौसम पर निर्भर होना पावर सेक्टर के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
कोयले के स्टॉक में भारी कमी
सबसे चिंताजनक बात पावर प्लांट्स में कोयले की इन्वेंट्री का कम होना है। सितंबर के अंत तक कोयले का स्टॉक 21 मिलियन टन था, जो कि नॉर्मेटिव लेवल का सिर्फ 36% है। स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन पावर प्लांट्स में कोयला स्टॉक 25% से कम था, उनकी संख्या अगस्त के 32 से बढ़कर अक्टूबर की शुरुआत तक 85 हो गई है।
लॉजिस्टिक्स में सुधार की कोशिश
इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने सप्लाई चेन को तेज कर दिया है। कोयला रेक (Rake) लोडिंग की संख्या अगस्त के औसत 280 से बढ़कर सितंबर में 426 हो गई। वहीं, अक्टूबर के शुरुआती दस दिनों में यह आंकड़ा 469 के औसत तक पहुंच गया है। निवेशकों के लिए अब पावर और कोल लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि इन्हीं के ऑपरेशंस पर फिलहाल देश की बिजली ग्रिड की स्थिरता टिकी है।
