भारत में बिजली की मांग में भारी उछाल के साथ स्पॉट प्राइसेज **2026** के पीक पर पहुंच गए हैं। सितंबर में डिमांड **269 GW** दर्ज की गई, जबकि मानसून की कमी ने हाइड्रो पावर और कोल स्टॉक पर संकट बढ़ा दिया है।
भारतीय स्पॉट मार्केट में बिजली की कीमतें साल 2026 के अपने सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) के डेटा के अनुसार, सितंबर में मार्केट क्लियरिंग प्राइसेज लगातार रेगुलेटरी सीलिंग यानी ₹10 प्रति यूनिट के स्तर को छू रहे हैं। यह रिकॉर्ड तोड़ डिमांड और सप्लाई के बीच के असंतुलन का नतीजा है।
डिमांड और ग्रिड पर दबाव
10 सितंबर 2026 को भारत में पीक पावर डिमांड 269 GW दर्ज की गई, जो आमतौर पर गर्मियों में देखने को मिलती है। मानसून में 15% की कमी ने हाइड्रो पावर जेनरेशन को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस कमी को पूरा करने के लिए ग्रिड को अब थर्मल पावर प्लांट्स पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है।
कोयले का संकट
थर्मल प्लांट्स पर बढ़ते दबाव ने सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है। सितंबर की शुरुआत तक, करीब 58 थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक खतरनाक स्तर तक गिर गया है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ी चिंता है, क्योंकि ईंधन की सप्लाई में कोई भी रुकावट पावर जनरेशन को बाधित कर सकती है।
प्रोड्यूसर्स और DISCOMs पर असर
जिन इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स के पास अनकॉन्ट्रैक्टेड क्षमता है, उन्हें ऊंचे दाम मिलने से मुनाफा होने की उम्मीद है। हालांकि, रेगुलेटरी प्राइस कैप के कारण उनके मुनाफे की एक ऊपरी सीमा तय है। दूसरी ओर, स्टेट DISCOMs पर भारी आर्थिक बोझ बढ़ गया है। महंगे दाम पर बिजली खरीदने की मजबूरी उनके फाइनेंशियल हेल्थ को बिगाड़ रही है, जिससे पावर जनरेटर्स के पेमेंट में देरी का खतरा बना हुआ है।
आगे क्या होगा?
निवेशकों को अब मानसून की स्थिति और कोयले के इन्वेंट्री लेवल पर नजर रखनी चाहिए। अगर बारिश में सुधार होता है, तो हाइड्रो पावर से राहत मिल सकती है। इसके अलावा, पावर एक्सचेंज पर अगर प्राइस कैप में कोई बदलाव होता है, तो उसका सीधा असर पावर कंपनियों के रेवेन्यू पर पड़ेगा।
