मानसून की भारी बारिश के कारण देश के 45 थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक घटकर केवल 10 दिन का रह गया है। बिजली की मांग बनी रहने के कारण सरकार को प्लांट्स का मेंटेनेंस भी टालना पड़ रहा है, जिससे पावर कंपनियों के लिए ऑपरेशनल रिस्क बढ़ गया है।
सप्लाई चेन पर मानसून का साया
भारत का पावर सेक्टर इस समय एक बड़ी सप्लाई चेन चुनौती से जूझ रहा है। ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे प्रमुख माइनिंग राज्यों में हो रही मूसलाधार बारिश ने कोयले के प्रोडक्शन और उसकी ट्रांसपोर्टेशन को बुरी तरह प्रभावित किया है। अगस्त 2026 के अंत तक इन प्लांट्स में कोयले का स्टॉक गिरकर लगभग 30.95 मिलियन टन पर आ गया है, जो अब मात्र 10 दिन की जरूरतों को ही पूरा कर पा रहा है, जबकि जुलाई में यह स्टॉक 12 दिन का था।
हालांकि देश में कोयले की कुल उपलब्धता 148 मिलियन टन के आसपास बनी हुई है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या इसे माइन से पावर प्लांट तक पहुँचाने की है। रेल ट्रांसपोर्ट की धीमी रफ्तार और माइनिंग एरिया में पानी भरने के कारण लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें बढ़ गई हैं।
मेंटेनेंस टालने की मजबूरी और रिस्क
बिजली की भारी मांग और ग्रिड की स्टेबिलिटी को बनाए रखने के लिए पावर मिनिस्ट्री ने कंपनियों को अपने तय मेंटेनेंस शेड्यूल को फिलहाल टालने का निर्देश दिया है। हालांकि यह कदम तत्काल बिजली कटौती को रोकने के लिए जरूरी है, लेकिन लंबे समय में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मेंटेनेंस टालने से मशीनों की एफिशिएंसी कम हो सकती है, जिससे भविष्य में बड़ी मरम्मत का खर्च या अनचाहे शटडाउन का खतरा बढ़ जाता है।
निवेशकों के लिए बड़ी चिंता
NTPC, Tata Power और Adani Power जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए यह स्थिति एक बड़ी परीक्षा है। अगर कोयले की किल्लत बनी रहती है, तो इन कंपनियों को स्पॉट मार्केट से महंगा कोयला खरीदना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा। साथ ही, डिस्कॉम (DISCOMs) के लिए बिजली की खरीद महंगी हो जाएगी, जिससे स्टेट-ओनड डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों की माली हालत और बिगड़ सकती है। अब निवेशकों की नजरें मानसून के थमने और कोयले के स्टॉक के रिकवरी डेटा पर टिकी हैं।
