सितंबर में भारत की बिजली मांग रिकॉर्ड **269 GW** के स्तर पर पहुंच गई, जिससे ग्रिड पर भारी दबाव देखा गया। हालांकि अक्टूबर में कोयले की सप्लाई **36%** बढ़ी है, लेकिन स्टील और केमिकल जैसे सेक्टर्स के लिए ऑपरेशनल जोखिम अभी भी बने हुए हैं।
भारत का इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर फिलहाल रिकॉर्ड डिमांड के चलते काफी दबाव में है। सितंबर में मांग 269 GW के उच्च स्तर पर पहुंच गई थी, जिसके मुख्य कारणों में कमजोर हाइड्रोपावर आउटपुट और कूलिंग की बढ़ती जरूरतें शामिल थीं। राहत की बात यह है कि अक्टूबर की शुरुआत से स्थिति में सुधार दिख रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, थर्मल पावर प्लांट्स को कोयले की सप्लाई में 36% का इजाफा हुआ है और अब रोजाना औसतन 465 से ज्यादा रेल रेक (rake) लोडिंग हो रही है।
इंडस्ट्री पर गहराता संकट
कोयले की सप्लाई बढ़ने के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए चुनौतियां बरकरार हैं। खास तौर पर मेटलर्जी और केमिकल बनाने वाली कंपनियों के लिए बिजली की निर्बाध आपूर्ति जरूरी है। छोटे स्टील मिल्स के लिए अचानक पावर कट काफी महंगा साबित होता है। यदि बिजली जाने से फर्नेस बंद होता है, तो पिघली हुई धातु के जमने से भारी नुकसान होता है और उसे फिर से पिघलाने में मोटी लागत आती है। जिन कंपनियों के पास बैकअप पावर इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, उनके मार्जिन पर इसका सीधा असर पड़ना तय है।
DISCOMs की वित्तीय सेहत
ग्रिड सप्लाई में कमी आने पर डिस्कॉम (DISCOMs) को स्पॉट मार्केट से बिजली खरीदनी पड़ती है। स्पॉट मार्केट में बिजली की कीमतें कभी-कभी ₹20 प्रति यूनिट तक पहुंच जाती हैं, जिससे इन सरकारी वितरण कंपनियों पर वित्तीय बोझ बढ़ जाता है। निवेशकों के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि डिस्कॉम की खराब फाइनेंशियल हेल्थ का असर पावर जनरेशन कंपनियों के पेमेंट साइकिल पर भी पड़ता है।
कोयले का बफर और सप्लाई चेन
सरकार थर्मल पावर प्लांट्स के लिए 'क्रिटिकल स्टॉक' टैग का इस्तेमाल अर्ली-वार्निंग के तौर पर कर रही है। सितंबर के अंत से घरेलू प्लांट्स में कोयले का स्टॉक 18 मिलियन टन से ऊपर बना हुआ है, जो पिछले हाई-डिमांड पीरियड्स की तुलना में बेहतर बफर है।
निवेशकों के लिए सलाह
आने वाली दो तिमाहियों के रिजल्ट्स पर नजर रखना बेहद जरूरी है। निवेशकों को कंपनी मैनेजमेंट की कमेंट्री पर फोकस करना चाहिए कि एनर्जी कॉस्ट और बिजली कटौती का उनके उत्पादन पर कितना असर पड़ा है। बड़ी कंपनियां तो इस लागत को मैनेज कर सकती हैं, लेकिन स्टील और केमिकल सेक्टर की छोटी कंपनियों के लिए यह एक बड़ा रिस्क फैक्टर हो सकता है।
