भारत में बिजली की मांग ने नया रिकॉर्ड बनाया है। अगस्त महीने में बिजली की खपत बढ़कर **169.01 बिलियन यूनिट** हो गई है, जो पिछले साल के मुकाबले **12.85%** ज्यादा है। भीषण उमस और बढ़ते कूलिंग लोड के चलते पावर सेक्टर पर दबाव बढ़ता दिख रहा है।
अगस्त 2026 में भारत की बिजली खपत में 12.85% की जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है। पिछले साल अगस्त में यह आंकड़ा 149.76 बिलियन यूनिट था, जो अब बढ़कर 169.01 बिलियन यूनिट तक पहुंच गया है। इस तेजी का सबसे बड़ा कारण पूरे देश में बनी हुई चिपचिपी उमस है, जिसके चलते घरों और कमर्शियल ऑफिसों में एयर कंडीशनिंग और कूलिंग उपकरणों का इस्तेमाल लगातार बढ़ गया है।
पीक डिमांड में इजाफा
अगस्त में पीक पावर डिमांड 258.27 गीगावाट के स्तर को छू गई। हालांकि यह मई 2026 में दर्ज किए गए 270.82 गीगावाट के रिकॉर्ड से थोड़ा कम है, लेकिन पिछले साल के अगस्त के 229.72 गीगावाट के मुकाबले यह काफी ज्यादा है। इससे साफ है कि कूलिंग की मांग अब सिर्फ गर्मियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मानसून के अंत तक भी ऊर्जा की खपत को प्रभावित कर रही है।
जनरेशन और फ्यूल मिक्स पर असर
लगातार बढ़ती मांग का सीधा असर पावर जनरेशन कंपनियों पर पड़ रहा है। India Meteorological Department के अनुसार, मानसून की बारिश कम होने से जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से नीचे है। इससे हाइड्रो पावर का उत्पादन घट गया है। जब हाइड्रो से बिजली कम मिलती है, तो कंपनियों को थर्मल और गैस-आधारित प्लांट्स पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे कोयले की खपत और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ जाती है, जो पावर प्रोड्यूसर्स के मार्जिन पर असर डालती है।
निवेशकों के लिए रिस्क और मॉनिटरेबल्स
एनर्जी सेक्टर में इस वक्त कुछ अहम रिस्क फैक्टर बने हुए हैं। पहला, स्टेट-ओन्ड DISCOMs की खराब आर्थिक स्थिति है। ज्यादा बिजली खरीदने की लागत के कारण अक्सर पेमेंट में देरी होती है, जिसका बुरा असर जनरेशन और ट्रांसमिशन कंपनियों के कैश फ्लो पर पड़ता है। साथ ही, ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार दबाव बना हुआ है, जिससे मेंटेनेंस की जरूरत बढ़ रही है। निवेशकों की नजर अब सितंबर के डेटा पर है कि क्या उमस के कारण यह हाई-लोड डिमांड आगे भी बनी रहती है और कोयला स्टॉक की स्थिति क्या रहती है।
