सितंबर 2026 में भारत का पावर ग्रिड **56 करोड़ यूनिट** की बिजली कमी से जूझ रहा है, जो पिछले 10 सालों में सबसे अधिक है। मॉनसून में **13%** कम बारिश के कारण हाइड्रो पावर उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। सप्लाई को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने थर्मल पावर प्लांट्स को फुल कैपेसिटी पर चलाने का निर्देश दिया है और **₹1.86 लाख करोड़** की 'PM-DHARA' स्कीम को मंजूरी दी है।
सितंबर 2026 में बिजली क्षेत्र ने एक बड़ी चुनौती का सामना किया है, जहाँ मांग और सप्लाई के बीच का अंतर पिछले एक दशक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। मॉनसून में 13% की कमी ने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसका उत्पादन पहली छमाही में अनुमान से 12% कम रहा। हाइड्रो पावर, जो शाम के समय सोलर एनर्जी की कमी को पूरा करने के लिए एक 'बफर' का काम करती है, की कमी से ग्रिड पर भारी दबाव बना और पीक डिमांड 269 GW तक पहुंच गई।
सरकार का कड़ा रुख और नई पहल
इस संकट से निपटने के लिए बिजली मंत्रालय ने 'इलेक्ट्रिसिटी एक्ट' की धारा 11 लागू कर दी है। इसके तहत सभी कैप्टिव थर्मल पावर प्लांट्स को 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2026 तक अपनी पूरी क्षमता पर बिजली उत्पादन करना होगा। साथ ही, सरकार ने ₹1.86 लाख करोड़ की 'PM-DHARA' योजना को हरी झंडी दे दी है। इसका मुख्य मकसद ट्रांसमिशन नेटवर्क को आधुनिक बनाना और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) को तेजी से लागू करना है, ताकि ग्रिड में लचीलापन आ सके।
थर्मल सेक्टर के सामने चुनौतियां
भले ही सरकार ने थर्मल प्लांट्स को फुल कैपेसिटी पर चलाने का आदेश दिया हो, लेकिन जमीनी हकीकत थोड़ी चिंताजनक है। 30 सितंबर तक 84 थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक क्रिटिकल स्तर पर था, जो जरूरी भंडार का महज 36% है। खनन क्षेत्रों में बाढ़ और लॉजिस्टिक्स की दिक्कतों के कारण कोयले की सप्लाई बाधित हो रही है। निवेशकों के लिए अब देखने वाली बात यह होगी कि थर्मल प्लांट्स इन चुनौतियों के बीच कितनी कुशलता से काम कर पाते हैं और PM-DHARA योजना के तहत बैटरी स्टोरेज का काम कितनी तेजी से आगे बढ़ता है।
