भारत का बड़ा कदम: 2033 तक 5 स्वदेशी स्मॉल मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर होंगे तैयार

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत का बड़ा कदम: 2033 तक 5 स्वदेशी स्मॉल मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर होंगे तैयार

भारत सरकार ने बड़ा ऐलान किया है कि साल 2033 तक 5 स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) तैयार कर लिए जाएंगे। ये रिएक्टर्स भारी उद्योगों को बिजली देने और दूरदराज के इलाकों में ऊर्जा पहुंचाने का काम करेंगे। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) इन्हें विकसित कर रहा है, जिसका मकसद नई रिएक्टर टेक्नोलॉजी और ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन से ऊर्जा स्वतंत्रता को बढ़ाना है।

Detailed Coverage

BARC की रिएक्टर टेक्नोलॉजी और साइट्स

भारतीय सरकार ने साफ कर दिया है कि 2033 तक 5 स्वदेशी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) चालू हो जाएंगे। यह देश के न्यूक्लियर एनर्जी प्लान में एक बड़ा बदलाव है। ये छोटे और एडवांस रिएक्टर, पारंपरिक बड़े परमाणु प्लांट की तुलना में ज्यादा लचीले और बनाने में आसान होंगे, जिनमें अक्सर लंबा समय और मुश्किल साइट की जरूरत होती है।

भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) इस टेक्नोलॉजी को आगे बढ़ा रहा है। फिलहाल तीन खास रिएक्टर मॉडल पाइपलाइन में हैं। इनमें सबसे अहम है 220-MWe का 'भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (BSMR-200)' और एक छोटा 55-MWe का यूनिट। दोनों ही प्रेसराइज्ड वाटर रिएक्टर (PWR) टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, जो दुनिया भर में एक सिद्ध डिजाइन है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इन शुरुआती यूनिट्स के लिए महाराष्ट्र के तारापुर को साइट चुना गया है, ताकि मौजूदा न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर का फायदा उठाकर कंस्ट्रक्शन में तेजी लाई जा सके।

उद्योगों के लिए बिजली और ग्रीन हाइड्रोजन

सिर्फ बिजली बनाने के अलावा, इस पहल का लक्ष्य खास औद्योगिक उपयोगों को पूरा करना भी है। एक तीसरा डिजाइन, हाई टेम्परेचर गैस कूल्ड रिएक्टर (HTGCR), जिसकी क्षमता 5-MWth तक है, विशेष उपयोग के लिए विकसित किया जा रहा है। पारंपरिक रिएक्टर्स के विपरीत, यह यूनिट औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए हीट सोर्स का काम करेगा। इसमें कॉपर-क्लोरिन साइकिल जैसे थर्मोकेमिकल साइकिल का उपयोग करके ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन भी शामिल है। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम को इस खास टेक्नोलॉजी के लिए आइडेंटिफाइड लोकेशन बनाया गया है।

एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में रणनीतिक भूमिका

इस कदम का उद्देश्य भारत के एनर्जी-इंटेंसिव सेक्टर्स जैसे स्टील, सीमेंट और एल्युमीनियम को सपोर्ट करना है, जिन्हें स्थिर और हाई-लोड पावर की जरूरत होती है। कैप्टिव पावर सॉल्यूशंस (फैक्ट्री या इंडस्ट्रियल क्लस्टर के लिए विशेष रूप से जेनरेट की गई बिजली) प्रदान करके, ये SMRs इंडस्ट्री को राष्ट्रीय ग्रिड और फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, सरकार पुराने कोल-बेस्ड थर्मल पावर प्लांट्स को फिर से इस्तेमाल करने के विकल्पों पर भी विचार कर रही है, क्योंकि इनमें पहले से ही जरूरी ग्रिड कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।

निवेशकों के लिए, इस पॉलिसी का लॉन्ग-टर्म असर स्थानीय, कार्बन-फ्री इंडस्ट्रियल पावर की क्षमता पर केंद्रित है। हालांकि यह प्रोजेक्ट अभी डेवलपमेंट फेज में है, लेकिन मुख्य मॉनिटर करने वाली चीजें फाइनल प्रोजेक्ट टाइमलाइन, शुरुआती रिएक्टर प्रोटोटाइप की सफलता और इन विशेष कंपोनेंट्स के लिए मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन पर सरकार का रुख होंगी। जैसे-जैसे भारत अपनी एनर्जी मिक्स में अधिक न्यूक्लियर कैपेसिटी को इंटीग्रेट करने की ओर बढ़ रहा है, न्यूक्लियर कंस्ट्रक्शन में शामिल सरकारी कंपनियों का प्रदर्शन और प्राइवेट सेक्टर इंजीनियरिंग व इक्विपमेंट सप्लायर्स के लिए भविष्य के प्रोक्योरमेंट अवसर देखने लायक होंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.