भारत सरकार ने अपनी थर्मल पावर कैपेसिटी को 2035-36 तक बढ़ाकर **315 गीगावाट (GW)** करने का खाका तैयार किया है। कोयले पर निर्भरता को बरकरार रखते हुए सरकार अब ग्रिड स्टेबिलिटी पर जोर दे रही है, जिससे पावर कंपनियों और इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स के लिए बड़े मौके बन रहे हैं।
भारत अपनी बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने के लिए कोयले को अगले दशक तक मुख्य ऊर्जा स्रोत बनाए रखने की तैयारी में है। सरकार के नए रोडमैप के तहत, देश की मौजूदा थर्मल पावर क्षमता को 224 गीगावाट से बढ़ाकर 315 गीगावाट किया जाएगा।
पावर सेक्टर में एक्शन
मिनिस्ट्री ऑफ पावर फिलहाल 50 गीगावाट की क्षमता पर काम कर रही है, जिसमें से पिछले दो सालों में ही 31 गीगावाट की क्षमता चालू (Commissioned) की जा चुकी है। इसके अलावा, 10 से 11 गीगावाट के प्रोजेक्ट्स अभी अप्रूवल फेज में हैं। इस तेजी का सीधा फायदा NTPC, Tata Power और JSW Energy जैसी पावर यूटिलिटीज के साथ-साथ BHEL और L&T जैसे इक्विपमेंट मेकर्स को मिलने की उम्मीद है।
कोल गैसीफिकेशन पर सरकार का दांव
सरकार केवल बिजली बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि कोल गैसीफिकेशन (Coal Gasification) के जरिए सिंथेटिक गैस बनाने पर भी जोर दे रही है। यह कदम देश को विदेशी ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने और ग्लोबल प्राइस की अस्थिरता से बचाने में मदद करेगा।
निवेशकों के लिए चेतावनी
विस्तार के इस दौर में कुछ चुनौतियां भी हैं। थर्मल प्लांट्स के लिए जमीन अधिग्रहण, एनवायर्नमेंटल क्लीयरेंस और कड़े उत्सर्जन नियमों का पालन करना अनिवार्य है। विशेष रूप से, Flue Gas Desulfurization (FGD) सिस्टम लगाने का खर्च कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। निवेशकों को अब इन प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और एनवायर्नमेंटल कंप्लायंस से जुड़े खर्चों पर बारीक नजर रखनी चाहिए।
