Northern Sea Route: भारत और रूस की नई पहल, **2027** में आर्कटिक के रास्ते होगा समुद्री ट्रायल

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AuthorAditya Rao|Published at:
Northern Sea Route: भारत और रूस की नई पहल, **2027** में आर्कटिक के रास्ते होगा समुद्री ट्रायल

भारत और रूस साल **2027** में नॉर्दर्न सी रूट (Northern Sea Route) के जरिए एक पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत करने जा रहे हैं। इसका मकसद क्रूड ऑयल, LNG और कोकिंग कोल जैसे जरूरी सामानों के लिए एक छोटा और सुरक्षित लॉजिस्टिक रूट तैयार करना है।

भारत और रूस ने आर्कटिक क्षेत्र से गुजरने वाले 'नॉर्दर्न सी रूट' पर अपनी मुहर लगा दी है। 2027 में होने वाला यह पायलट प्रोजेक्ट भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और सप्लाई चेन में विविधता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इसके जरिए क्रूड ऑयल, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG), कोकिंग कोल और फर्टिलाइजर्स की शिपिंग को आसान बनाने की कोशिश की जाएगी।

क्यों है यह रास्ता इतना खास?

मौजूदा समुद्री रास्तों के मुकाबले आर्कटिक रूट काफी छोटा है। फिलहाल भारतीय बंदरगाहों से माल पहुंचने में 8,600 नॉटिकल माइल्स से ज्यादा की दूरी तय करनी पड़ती है, जिसमें कई हफ्तों का समय लगता है। यह नया रास्ता लॉजिस्टिक्स कॉस्ट को कम करने की बड़ी क्षमता रखता है। हालांकि, यह 5,600 किलोमीटर लंबा सफर साल के ज्यादातर समय बर्फ से ढका रहता है। इसे पार करने के लिए रूस की कंपनी Rosatom के न्यूक्लियर-पावर्ड आइसब्रेकर्स (Icebreakers) की मदद अनिवार्य होगी।

चुनौतियां और जोखिम

रणनीतिक फायदे तो बहुत हैं, लेकिन इसका कमर्शियल इस्तेमाल कई कारकों पर निर्भर करेगा। आर्कटिक के बेहद खराब मौसम, जहाजों के लिए हाई इंश्योरेंस प्रीमियम और आइसब्रेकर सर्विस की लागत बड़ी बाधाएं हो सकती हैं। साथ ही, 2027 का यह पायलट प्रोजेक्ट यह तय करेगा कि क्या यह रास्ता भविष्य में व्यापार के लिए एक सस्टेनेबल और सस्ता विकल्प बन सकता है या नहीं।

भारतीय निवेशकों और स्टील मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए यह अपडेट काफी अहम है, क्योंकि कोकिंग कोल की आसान आपूर्ति सीधे तौर पर इंडस्ट्री के मुनाफे को प्रभावित करती है। बाजार के जानकारों की नजर अब इस बात पर है कि क्या यह प्रयोग देश की एनर्जी प्रोक्योरमेंट कॉस्ट को घटाने में सफल हो पाएगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.