भारत में बिजली की मांग रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है। मई 2026 में पीक डिमांड **12%** बढ़कर **270.8 गीगावाट (GW)** हो गई। वहीं, जून में शाम के समय **3,045 मेगावाट (MW)** का सप्लाई गैप देखा गया, जो ट्रांसमिशन की दिक्कतों की ओर इशारा करता है।
बिजली की मांग ने तोड़े सारे रिकॉर्ड
भारत के पावर सेक्टर ने मई 2026 में 270.8 गीगावाट (GW) की रिकॉर्ड पीक डिमांड दर्ज की। यह पिछले साल की तुलना में 12% की बड़ी बढ़ोतरी है। हालांकि, देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 548.86 GW है, जो कुल मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। इसके बावजूद, जून के महीने में शाम के घंटों के दौरान 3,045 मेगावाट (MW) का सप्लाई गैप सामने आया।
ट्रांसमिशन की बाधाएं बनीं वजह
यह सप्लाई गैप पावर प्लांट्स की कमी के कारण नहीं है, बल्कि ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में आ रही बाधाओं के चलते है, खासकर उत्तरी क्षेत्रों में। इसका मतलब यह है कि भले ही राष्ट्रीय स्तर पर बिजली उपलब्ध हो, लेकिन पंजाब, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में उपभोक्ताओं तक इसे पहुंचाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर में इस्तेमाल में आई तेजी को संभालने की क्षमता कम पड़ रही है। जून में अकेले उत्तरी क्षेत्र में 2,650 MW की कमी देखी गई, जो बेहतर ग्रिड कनेक्टिविटी की तत्काल आवश्यकता को उजागर करती है।
शाम की डिमांड और थर्मल पावर पर निर्भरता
शाम के समय यह समस्या और बढ़ जाती है। सूरज ढलने के साथ ही सोलर पावर का उत्पादन कम हो जाता है, जबकि बिजली की मांग बनी रहती है। ऐसे में ग्रिड को भारी मात्रा में थर्मल पावर पर निर्भर रहना पड़ता है। जून में कुल उत्पादन का 68% से अधिक कोयला-आधारित थर्मल ऊर्जा से आया। यह पारंपरिक स्रोतों पर निर्भरता को तो दिखाता ही है, साथ ही पर्याप्त बैकअप के बिना सिर्फ इन पर निर्भर रहने की सीमाओं को भी उजागर करता है।
एनर्जी स्टोरेज और ग्रिड आधुनिकीकरण पर फोकस
अब निवेश का रुख लॉन्ग-टर्म सॉल्यूशंस की ओर बढ़ रहा है, जैसे कि बैटरी एनर्जी स्टोरेज और पांप्ड-हाइड्रो प्रोजेक्ट्स। इन तकनीकों का उद्देश्य दिन की तेज धूप के दौरान उत्पन्न ऊर्जा को स्टोर करना और शाम को जरूरत पड़ने पर उसे जारी करना है, ताकि अतिरिक्त थर्मल पावर पर निर्भर न रहना पड़े।
डिस्कोम की वित्तीय स्थिति एक बड़ा जोखिम
हालांकि, सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कोम) की वित्तीय सेहत इस सेक्टर के लिए एक बड़ा जोखिम बनी हुई है। यदि ये कंपनियां वित्तीय दबाव में बनी रहती हैं, तो वे आवश्यक ग्रिड अपग्रेड में निवेश करने या बिजली उत्पादकों को समय पर भुगतान करने में संघर्ष कर सकती हैं।
आगे क्या?
आने वाले समय में, निवेशक ग्रिड आधुनिकीकरण की गति और नई एनर्जी स्टोरेज की बोलियों पर नजर रखेंगे। सरकार की ट्रांसमिशन बाधाओं को दूर करने और वितरण नेटवर्क की परिचालन क्षमता में सुधार करने की क्षमता यह निर्धारित करेगी कि आने वाली तिमाहियों में सप्लाई गैप कम होगा या नहीं। बैटरी स्टोरेज क्षमता में वृद्धि और वितरण कंपनियों के लिए वित्तीय सुधारों से जुड़ी खबरें पावर सप्लाई चेन की स्थिरता और विकास के लिए महत्वपूर्ण होंगी।
