ऑयल सेक्टर का मिला-जुला हाल
PL Capital की रिपोर्ट बताती है कि फाइनेंशियल ईयर 2026 की चौथी तिमाही (Q4 FY26) में भारत का ऑयल और गैस सेक्टर एक मिला-जुला समीकरण पेश कर रहा है। हालांकि, अनुमान है कि पिछले क्वार्टर की तुलना में कुल बिक्री (Sales) करीब 7.0% बढ़ेगी, लेकिन मुनाफे में कमी आने की आशंका है। कुल EBITDA में लगभग 10.5% और नेट प्रॉफिट में करीब 17.6% की गिरावट का अनुमान है। यह बड़ा अंतर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों और सप्लाई चेन पर पड़ने वाले असर की वजह से है।
अपस्ट्रीम और रिफाइनरी कंपनियों को फायदा
इस तस्वीर में फायदे में रहने वालों की बात करें तो अपस्ट्रीम (Exploration and Production) कंपनियाँ लगातार ऊंची क्रूड ऑयल कीमतों का लाभ उठा रही हैं। इनके EBITDA में तिमाही-दर-तिमाही (QoQ) करीब 20% की जबरदस्त बढ़ोतरी की उम्मीद है। वहीं, रिफाइनर्स (Refiners) भी बेहतर क्रैक स्प्रेड्स (Crack Spreads) की वजह से अच्छा कर रहे हैं। Mangalore Refinery and Petrochemicals Ltd. (MRPL) का EBITDA तिमाही-दर-तिमाही करीब 13.6% बढ़ सकता है। MRPL के शेयर ₹179.33 के आसपास ट्रेड कर रहे थे, जिसका P/E रेश्यो लगभग 14.5x था। हालांकि, कुछ एनालिस्ट्स ने ₹130 से ₹145 के टारगेट प्राइस के साथ सावधानी बरतने की सलाह भी दी है।
Reliance Industries पर लागत का असर, लेकिन ग्रोथ जारी
Reliance Industries Ltd. (RIL) के लिए भी यह दौर मिला-जुला रहेगा। बढ़ी हुई ऊर्जा कीमतों और लॉजिस्टिक्स की दिक्कतों के कारण शिपिंग और फ्रेट कॉस्ट्स बढ़ने से RIL के स्टैंडअलोन EBITDA में करीब 5.0% की तिमाही गिरावट का अनुमान है। लेकिन, RIL के ग्रोथ इंजन, Reliance Jio और रिटेल बिजनेस में मजबूती बनी हुई है। Jio में करीब 3.3% और रिटेल में लगभग 1.5% की तिमाही बढ़ोतरी की उम्मीद है। RIL का मार्केट कैप करीब ₹17.65 ट्रिलियन है और इसका P/E रेश्यो 20-23x के आसपास है। एनालिस्ट्स इसे 'Strong Buy' रेटिंग दे रहे हैं, जिनका औसत 12 महीने का टारगेट प्राइस लगभग ₹1,720 है। दिसंबर 2025 में S&P Global ने भी RIL की रेटिंग को 'A-' तक बढ़ाया था।
डाउनस्ट्रीम ऑपरेटरों पर बढ़ी लागत की मार
दूसरी तरफ, ऑयल मार्केटिंग कंपनीज (OMCs), सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) प्रोवायडर्स और अन्य गैस यूटिलिटीज पर भारी दबाव है। OMCs का EBITDA और नेट प्रॉफिट बड़ी गिरावट के साथ क्रमशः लगभग 33.4% और 43.1% QoQ तक गिर सकता है। CGD और गैस यूटिलिटी कंपनियों का EBITDA भी करीब 13.0% और 19.0% QoQ तक लुढ़कने का अनुमान है। इसकी मुख्य वजह यह है कि रेगुलेटेड कीमतों और कैप्स के चलते वे बढ़ी हुई इनपुट कॉस्ट को पूरी तरह से ग्राहकों पर पास ऑन नहीं कर पा रहे हैं। इससे मांग पर भी असर पड़ सकता है।
वैश्विक कीमतें और भारत के आर्थिक जोखिम
मध्य पूर्व के संघर्ष ने क्रूड ऑयल की कीमतों को और भड़का दिया है। मार्च 2026 में ब्रेंट (Brent) क्रूड औसतन $103 प्रति बैरल रहा, जबकि WTI $90-100 के बीच रहा। भारत अपनी जरूरत का करीब 86% क्रूड ऑयल इम्पोर्ट करता है, साथ ही बड़ा हिस्सा नेचुरल गैस और LPG का भी इम्पोर्ट करता है। ऐसे में, देश को कई बड़े आर्थिक जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) का बढ़ना, रुपये का कमजोर होना और महंगाई का बढ़ना शामिल है। फ्यूल और एनर्जी पर निर्भर बिजनेस अपने प्रॉफिट मार्जिन को सिकुड़ता हुआ देख रहे हैं, क्योंकि वे बढ़ी हुई लागत ग्राहकों से वसूल नहीं पा रहे। एनालिस्ट्स इस आर्थिक माहौल को देखते हुए कमाई के अनुमानों (Earnings Forecasts) को कम कर रहे हैं। Motilal Oswal का अनुमान है कि Nifty 50 की कंपनियों की Q4 FY26 में साल-दर-साल (YoY) कमाई 6% तक ही बढ़ेगी, जो कि एक बड़ी सुस्ती है। अगर टेंशन बनी रही तो और भी डाउनग्रेड्स देखने को मिल सकते हैं।
तेल के झटकों पर बाजारों की प्रतिक्रिया
ऐतिहासिक रूप से, तेल की कीमतों में अचानक बड़ी उछाल आने पर भारतीय बाजारों में शुरुआती गिरावट देखी गई है। उदाहरण के लिए, जब मार्च 2026 में ब्रेंट क्रूड $119 पर पहुंचा था, तो भारतीय इक्विटीज़ में लगभग 5% की गिरावट आई थी। हालांकि, 1995 के बाद के आंकड़े बताते हैं कि Nifty 50 आमतौर पर एक साल के भीतर ठीक हो जाता है, जिसमें ऐसे उछाल के बाद 12 महीने की औसत रिटर्न +16.5% रही है। पिछले दो दशकों में, Nifty और क्रूड ऑयल की कीमतें अक्सर साथ-साथ चली हैं, खासकर कुछ खास रेंज में, जो ग्लोबल ग्रोथ को दर्शाती हैं। लेकिन जब क्रूड की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर जाती हैं, तो यह लिंक अक्सर उलट जाता है, क्योंकि अर्थव्यवस्था महंगाई और घटते प्रॉफिट मार्जिन का पूरा असर महसूस करती है।
सेक्टर के लिए आगे क्या?
सेक्टर का तत्काल भविष्य मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक स्थिरता और ऊर्जा कीमतों पर इसके असर पर निर्भर करेगा। जहां अपस्ट्रीम और रिफाइनिंग सेगमेंट्स ऊंची कीमतों से फायदा उठाना जारी रख सकते हैं, वहीं डाउनस्ट्रीम कंपनियों की लाभप्रदता (Profitability) अनिश्चित बनी हुई है। निवेशक क्रूड की कीमतों में बदलाव, ईंधन करों और सब्सिडी पर सरकारी नीतियों और अर्निंग कॉल्स के दौरान कंपनियों के बयानों पर नजर रखेंगे ताकि सेक्टर की मजबूती और भविष्य का आकलन कर सकें। EIA का अनुमान है कि Q4 2026 तक ब्रेंट क्रूड $90/bbl से नीचे आ जाएगा, लेकिन अनिश्चितता के चलते इसमें कुछ प्रीमियम जुड़ा रहेगा।