सरकारी तेल कंपनियों का कैपेक्स (Capex) 3.8% घटा: 5 साल में पहली बार आई गिरावट

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
सरकारी तेल कंपनियों का कैपेक्स (Capex) 3.8% घटा: 5 साल में पहली बार आई गिरावट

भारत की सरकारी तेल कंपनियों ने चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में अपनी पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) में **3.8%** की कटौती की है। यह पिछले **5** सालों में पहली बार है जब खर्च में यह गिरावट देखी गई है। ONGC और Indian Oil जैसी कंपनियों में यह कटौती विशेष रूप से देखी गई।

कहां घटी कंपनियों की पूंजीगत व्यय?

भारत की बड़ी सरकारी तेल और गैस कंपनियों ने पिछले 5 सालों में पहली बार अपने कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) में कमी दर्ज की है। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में 12 पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) का कुल कैपेक्स 3.8% घटकर ₹27,161 करोड़ हो गया। यह इस क्षेत्र में 2021 से लगातार जारी ग्रोथ की ट्रेंड को तोड़ता है।

इस गिरावट के पीछे दो बड़ी कंपनियां प्रमुख रहीं। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) का कैपिटल आउटले पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 16.7% घटकर ₹6,834 करोड़ रहा। वहीं, देश की सबसे बड़ी रिफाइनर, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने 43% की बड़ी कटौती दर्ज की, जिसका खर्च घटकर ₹3,626 करोड़ रह गया। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) और ऑयल इंडिया जैसी अन्य बड़ी कंपनियों ने भी इस तिमाही में अपने खर्च में कमी की है।

बाजार की अस्थिरता और प्रोजेक्ट साइकल्स का असर

निवेशक अब इस बात का आकलन कर रहे हैं कि यह खर्च में कटौती लंबी अवधि की सावधानी का संकेत है या सिर्फ एक टाइमिंग का मामला। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि तेल और गैस PSUs अक्सर प्रोजेक्ट कंप्लीशन माइलस्टोन और रेगुलेटरी क्लीयरेंस के आधार पर अपने खर्च का प्रबंधन करते हैं, जिससे तिमाही आंकड़ों में उतार-चढ़ाव आ सकता है। यह भी संभव है कि वित्त वर्ष के दूसरे हिस्से में खर्च बढ़ाया जाए, क्योंकि अक्सर खर्च का एक बड़ा हिस्सा साल के अंत के लिए बचाकर रखा जाता है।

हालांकि, इस गिरावट के पीछे का माहौल थोड़ा जटिल है। फरवरी 2026 में अमेरिका-ईरान संघर्ष के बढ़ने के बाद से वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र अनिश्चितता का सामना कर रहा है। इस भू-राजनीतिक तनाव ने शिपिंग और बीमा की लागत बढ़ा दी है और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता पैदा की है, जिससे डाउनस्ट्रीम कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी प्रभावित हुई है। रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव बना हुआ है, जो मैनेजमेंट टीमों को बाजार में स्थिरता आने तक नई बड़ी इनवेस्टमेंट्स के मामले में अधिक सतर्क रहने के लिए प्रेरित कर सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती

भले ही यह तिमाही गिरावट एक अपवाद हो, यह इस क्षेत्र की एक पुरानी समस्या को उजागर करती है। पिछले दो वित्तीय वर्षों (FY25 और FY26) में रिकॉर्ड-तोड़ कैपेक्स के बावजूद, भारत का घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन लगातार गिरता रहा है। उच्च निवेश और स्थिर या गिरते उत्पादन के बीच यह असंतुलन इस क्षेत्र के लिए एक स्ट्रक्चरल रिस्क बना हुआ है। शेयरधारकों के लिए, यह सवाल उठता है कि कैपिटल एलोकेशन की एफिशिएंसी क्या है और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाने का अंतिम लक्ष्य क्या है।

इन कंपनियों पर नजर रखने वाले निवेशक संभवतः आने वाली तिमाहियों में प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन और खर्च में संभावित रिकवरी पर अपडेट की उम्मीद करेंगे। सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि कंपनियां आने वाली तिमाहियों में अपने कैपिटल प्रोग्राम को कितनी तेजी से बढ़ाती हैं, साथ ही मैनेजमेंट इस बात पर भी कमेंट्री देगा कि वे भू-राजनीतिक जोखिमों को अपने प्रोडक्शन और एक्सपेंशन लक्ष्यों के साथ कैसे संतुलित करने की योजना बना रहे हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.