टैक्स कटौती का ऊंट के मुंह में जीरा
हाल ही में पेट्रोल और डीजल पर की गई ₹10 प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी में कटौती, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए पर्याप्त राहत साबित नहीं हो रही है। Nomura के विश्लेषण से पता चलता है कि 27 मार्च से लागू यह कटौती, कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान की भरपाई करने में नाकाम है। इसकी मुख्य वजह ग्लोबल क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों में आई जबरदस्त तेजी है, जबकि घरेलू रिटेल फ्यूल प्राइस (Retail Fuel Price) लगभग स्थिर बनी हुई हैं।
मार्केटिंग मार्जिन में भारी गिरावट
इन कंपनियों को ईंधन की बिक्री पर अभी भी जबरदस्त घाटा हो रहा है। इनपुट लागत (Input Cost) तेजी से बढ़ी है, लेकिन पेट्रोल पंप पर कीमतें नियंत्रित हैं। Nomura का अनुमान है कि दिल्ली जैसे प्रमुख बाजारों में पेट्रोल और डीजल पर मार्केटिंग मार्जिन (Marketing Margin) बुरी तरह से नेगेटिव यानी घाटे में है, जिसमें ₹30-40 प्रति लीटर से भी ज्यादा का नुकसान हो रहा है। इसका सीधा मतलब है कि ड्यूटी कट के बावजूद, कंपनियां लागत से कम दाम पर ईंधन बेच रही हैं।
इंटीग्रेटेड ऑपरेशंस से मिली आंशिक राहत
हालांकि, ईंधन की बिक्री वाले मुख्य कारोबार में दिक्कतें हैं, लेकिन कुछ OMCs के लिए कुल मिलाकर वित्तीय तस्वीर बेहतर दिखती है। यह उनके रिफाइनिंग (Refining) और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों को ध्यान में रखने पर निर्भर करता है। Indian Oil Corporation Ltd (IOCL) शायद कुल मिलाकर ब्रेक-ईवन (Break-even) के करीब हो, जबकि Hindustan Petroleum Corporation Ltd (HPCL) अभी भी बड़े घाटे का सामना कर रही है। रिफाइनिंग मार्जिन (Refining Margin) और ऑपरेशनल गेन (Operational Gain) मार्केटिंग लॉस की भरपाई करने में मदद करते हैं, लेकिन वे इसे पूरी तरह से कवर नहीं कर पाते।
भविष्य का नज़रिया
सरकारी प्रयासों के बावजूद, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को बिक्री कारोबार में तब तक दिक्कतें आती रहेंगी जब तक घरेलू ईंधन की कीमतों को ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों के अनुरूप समायोजित नहीं किया जाता। यह स्थिति ग्लोबल ऑयल मार्केट और भारत की घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण नीतियों के बीच एक खाई को दर्शाती है।