भारत को अपनी ग्रिड को स्टेबल रखने के लिए साल 2032 तक एनर्जी स्टोरेज क्षमता को **54 GWh** से बढ़ाकर **411 GWh** करना होगा। इस बड़े लक्ष्य के लिए **₹4 लाख करोड़** के निवेश की जरूरत है, जो पावर कंपनियों के लिए बड़े कैपिटल एक्सपेंडिचर और एग्जीक्यूशन रिस्क का संकेत है।
पावर सेक्टर में बड़ा शिफ्ट
भारत का बिजली क्षेत्र एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जैसे-जैसे रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) का दायरा बढ़ रहा है, देश को अब एनर्जी स्टोरेज की भारी जरूरत है। यह इसलिए जरूरी है ताकि सूरज की रोशनी न होने या हवा न चलने पर भी बिजली की सप्लाई बाधित न हो। CareEdge Ratings के आंकड़ों के अनुसार, साल 2032 तक स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए करीब ₹4 लाख करोड़ के निवेश की दरकार है। यह निवेश रिन्यूएबल कैपेसिटी और बिजली उत्पादन के बीच के अंतर को पाटने के लिए अनिवार्य है।
स्टोरेज कैपेसिटी का लक्ष्य
फिलहाल, देश की ऑपरेशनल स्टोरेज क्षमता मिड-2026 तक 54 GWh थी, जिसे 2032 तक 411 GWh तक पहुंचाने का टारगेट रखा गया है। इसके लिए बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम और पंप स्टोरेज प्लांट्स पर जोर दिया जा रहा है। मार्केट में भी इसका असर दिखने लगा है, जहां स्टैंडअलोन स्टोरेज टेंडर FY25 के 7 GW से बढ़कर FY26 में 21 GW हो गए हैं। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि यूटिलिटी और रिन्यूएबल कंपनियों में अब बड़े स्तर पर कैपिटल स्पेंडिंग देखी जाएगी।
ट्रांसमिशन और चुनौतियां
स्टोरेज के अलावा, पावर ट्रांसमिशन नेटवर्क पर भी भारी ध्यान देना होगा। FY27 से FY31 के बीच ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अतिरिक्त ₹5.19 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान है। हालांकि ये प्रोजेक्ट्स स्टेबल कैश फ्लो देते हैं, लेकिन ये अक्सर जमीन अधिग्रहण और फॉरेस्ट क्लीयरेंस जैसी बाधाओं में फंस जाते हैं, जिससे प्रोजेक्ट में देरी और लागत बढ़ने का डर बना रहता है।
थर्मल पावर की प्रासंगिकता
ग्रीन एनर्जी की दौड़ के बावजूद, कोल-बेस्ड थर्मल पावर प्लांट अभी भी नेशनल ग्रिड की रीढ़ बने हुए हैं। जब रिन्यूएबल सप्लाई कम होती है, तो ये प्लांट बेसलोड पावर देकर ग्रिड को स्टेबल रखते हैं। यही वजह है कि थर्मल पावर कंपनियों में भी निवेश का महत्व बना हुआ है, जो रिन्यूएबल एनर्जी ट्रांजिशन की अस्थिरता को संतुलित करता है।
निवेशकों के लिए राय
आने वाले कुछ साल इस बात पर निर्भर करेंगे कि कंपनियां अपने कर्ज और प्रोजेक्ट टाइमलाइन को कैसे मैनेज करती हैं। निवेशकों को टेंडर अवार्ड्स, डेट-टू-इक्विटी रेशियो और कंस्ट्रक्शन साइट की प्रोग्रेस पर नजर रखनी चाहिए। एग्जीक्यूशन में किसी भी तरह की देरी निवेश के रिटर्न पर सीधा असर डाल सकती है।
