पश्चिम एशिया में छिड़े भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Turmoil) ने ऊर्जा बाज़ारों (Energy Markets) को हिलाकर रख दिया है। हॉरमूज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से सप्लाई रुकने के डर से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में ज़बरदस्त उछाल आया है।
बाज़ार पर असर
सोमवार को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स (Brent Crude Futures) $77.80-$79.41 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहे थे। ये तेज़ी हॉरमूज से संभावित सप्लाई रुकावटों के कारण थी, जिससे दुनिया का लगभग 20% ऑयल फ्लो (Oil Flow) होता है। वहीं, यूरोपियन नेचुरल गैस (Natural Gas) के दाम भी 40% बढ़कर €44.78 प्रति मेगावाट-घंटा (Megawatt-hour) के पार चले गए। ये हाल तब है जब कतर की एनर्जी फैसिलिटीज़ (Energy Facilities) पर हमले हुए और कतर एनर्जी (QatarEnergy) ने LNG प्रोडक्शन (Production) रोक दिया। हॉरमूज से टैंकरों का आना-जाना भी लगातार दूसरे दिन कम देखा गया।
इस अनिश्चितता के बीच, भारत की प्रमुख ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (Oil Marketing Companies) – इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), एचपीसीएल (HPCL), और बीपीसीएल (BPCL) – के शेयरों में भी हलचल देखी गई। IOC का शेयर ₹186.98 पर बंद हुआ, बीपीसीएल ₹367.10 के करीब रहा, जबकि एचपीसीएल के भाव बाज़ार के मूड के हिसाब से बदलते रहे।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर संकट?
भारत की एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) काफी हद तक समुद्री रास्तों पर निर्भर है, और हॉरमूज जलडमरूमध्य एक ऐसा अहम 'चोकपॉइंट' (Chokepoint) है। भारत अपने कच्चे तेल के 50% से ज़्यादा आयात (Import) (लगभग 25-27 लाख बैरल प्रति दिन) और लगभग सारा एलपीजी (LPG) इसी रास्ते से मंगाता है। खाड़ी देशों से लगातार 70% से ज़्यादा क्रूड की सप्लाई भारत को होती रही है।
हाल के सालों में रूस (Russia) सबसे बड़ा सप्लायर बनकर उभरा था, जो FY2024-25 में 35% से ज़्यादा की हिस्सेदारी रखता था। हालांकि, अमेरिकी व्यापार वार्ताओं और टैरिफ (Tariff) के चलते इसका हिस्सा अब घटकर 21-24% रह गया है। ऐसे में, भारत के पास रूसी तेल (Russian Oil) का विकल्प है, जो आसानी से उपलब्ध है। लेकिन अमेरिका के साथ व्यापारिक संवेदनशीलताएं और टैरिफ भी इस फैसले को मुश्किल बनाते हैं।
भारत के पास स्ट्रेटेजिक रिजर्व (Strategic Reserves) भी हैं, लेकिन ये ज़्यादा समय के लिए नहीं हैं। कच्चे तेल का स्टॉक लगभग 17-18 दिनों का, रिफाइंड फ्यूल (Refined Fuels) 20-21 दिनों का, और एलएनजी (LNG) का स्टॉक महज़ 10-12 दिनों का है। यह उन देशों से अलग है जो अपनी सप्लाई को ज़्यादा डायवर्सिफ़ाई (Diversify) करके रखते हैं।
बड़ी कमज़ोरियाँ और भविष्य का डर
वर्तमान में जो इमरजेंसी प्लान बनाए जा रहे हैं, वे भारत की संरचनात्मक कमज़ोरियों (Structural Weaknesses) को उजागर करते हैं। खासतौर पर एलपीजी के लिए, जिसके स्टॉक दो हफ्तों से भी कम के हैं, यह एक बड़ी असुरक्षा (Vulnerability) है। यदि सप्लाई चेन (Supply Chain) गंभीर रूप से बाधित होती है, तो ग्रामीण इलाकों में एलपीजी की राशनिंग (Rationing) तक करनी पड़ सकती है, जिससे लाखों घरों और व्यवसायों पर असर पड़ेगा।
इसके अलावा, रूस से तेल का आयात कम करने की हालिया प्रवृत्ति, जो अमेरिकी व्यापार नीति (Trade Policy) और सैंक्शन कंप्लायंस (Sanctions Compliance) से प्रभावित थी, एक दुविधा खड़ी करती है। रूसी तेल एक तत्काल विकल्प है, लेकिन इसे फिर से अपनाना अमेरिका के साथ व्यापारिक विवादों को हवा दे सकता है। हॉरमूज का अहम चोकपॉइंट यह सुनिश्चित करता है कि स्ट्रेटेजिक रिजर्व के बावजूद, अगर सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है, तो कीमतें $100 प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती हैं।
सऊदी अरब के रास तानूरा रिफाइनरी (Ras Tanura Refinery) और कतर की एलएनजी सुविधाओं पर हुए हमले इस बात का सबूत हैं कि खतरा सिर्फ़ सप्लाई रूट पर रुकावट का नहीं, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) पर भी है।
आगे क्या?
विश्लेषकों (Analysts) का मानना है कि तेल और गैस की कीमतों में अभी और तेज़ी देखी जा सकती है। हॉरमूज जलडमरूमध्य में व्यवधान कितने समय तक रहता है, यह तय करेगा कि स्थिति कितनी गंभीर होगी। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) का अनुमान है कि अगर एक महीने तक हॉरमूज बंद रहता है, तो यूरोपियन गैस की कीमतें दोगुनी से ज़्यादा हो सकती हैं।
हालांकि भारत के कच्चे तेल के भंडार और वैकल्पिक स्रोतों से आयात की संभावना अल्पकालिक झटकों से कुछ राहत दे सकती है, लेकिन एलपीजी और एलएनजी जैसे महत्वपूर्ण आयात के लिए महत्वपूर्ण ट्रांजिट रूटों (Transit Routes) पर देश की निर्भरता, इसे बड़े मूल्य जोखिम (Price Risk) और संभावित आपूर्ति की कमी (Supply Scarcity) के सामने खड़ा करती है, खासकर यदि संघर्ष बढ़ता है।
सरकार की यह सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता कि ईंधन उपलब्ध और किफायती बना रहे, भू-राजनीतिक संघर्ष (Geopolitical Conflict), बाज़ार की साइकोलॉजी (Market Psychology) और बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यापार गतिशीलता (International Trade Dynamics) के जुड़े हुए दबावों से परखी जाएगी।