निवेशकों का मोहभंग, प्रोजेक्ट पर अनिश्चितता के बादल
भारत के महत्वाकांक्षी रत्नागिरी रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स (RRPCL) प्रोजेक्ट पर इन दिनों अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय निवेशक, अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (Adnoc) ने इस प्रोजेक्ट से अपनी भागीदारी खत्म कर ली है, जबकि सऊदी अरब की तेल कंपनी Saudi Aramco भी अपनी हिस्सेदारी को लेकर नए सिरे से विचार-विमर्श कर रही है। उद्योग के सूत्रों के मुताबिक, यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि यह प्रोजेक्ट पिछले एक दशक से अटका हुआ है।
ज़मीन अधिग्रहण की मुश्किल बनी सबसे बड़ी बाधा
RRPCL प्रोजेक्ट, जिसे मूल रूप से Saudi Aramco, Adnoc और भारत की तीन सरकारी तेल कंपनियों - इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL), और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) - के बीच एक ज्वाइंट वेंचर के तौर पर शुरू किया गया था, महाराष्ट्र में ज़मीन अधिग्रहण की समस्याओं के कारण बुरी तरह फंसा हुआ है। इन देरी ने प्रोजेक्ट के पूरा होने की समय-सीमा को पूरी तरह से पटरी से उतार दिया है, जो मूल रूप से 2022 तक पूरा होना था। भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए ज़मीन हासिल करना अक्सर सबसे बड़ा जोखिम साबित होता है, जिससे सालों की देरी और लागत में भारी वृद्धि होती है।
Saudi Aramco की नज़र आंध्र प्रदेश पर
रत्नागिरी प्रोजेक्ट में चल रही अनिश्चितता के बीच, Saudi Aramco भारत में दूसरे विकल्पों पर भी सक्रिय रूप से विचार कर रही है। खबर है कि कंपनी आंध्र प्रदेश के रामयपटनम पोर्ट के पास भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) के साथ मिलकर 90 से 120 लाख टन प्रति वर्ष (mmtpa) क्षमता वाले एक नए रिफाइनरी-कम-पेट्रोकेमिकल्स कॉम्प्लेक्स में निवेश करने की इच्छुक है। इस प्रोजेक्ट में करीब ₹96,000 करोड़ का निवेश होने का अनुमान है। BPCL पहले ही ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) के साथ 10% हिस्सेदारी के लिए एक एमओयू (MoU) साइन कर चुकी है, और Saudi Aramco इसमें 20% तक हिस्सेदारी ले सकती है। BPCL के आंध्र प्रोजेक्ट को उसकी रणनीतिक तटीय लोकेशन, कच्चे तेल की आसान लॉजिस्टिक्स और ज़बरदस्त मांग के कारण प्राथमिकता दी जा रही है, जो रत्नागिरी प्रोजेक्ट की अंदरूनी लोकेशन और ज़मीन अधिग्रहण की मुश्किलों से बिल्कुल अलग है।
भारत में पेट्रोकेमिकल्स की बढ़ती मांग
यह सब तब हो रहा है जब भारत में पेट्रोकेमिकल्स की मांग लगातार बढ़ रही है, जो देश के तेल और गैस की खपत का एक प्रमुख जरिया बनने वाली है। भारत का पेट्रोकेमिकल सेक्टर कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो घरेलू मांग का लगभग 15% हिस्सा है, और इस खपत के बढ़ने की उम्मीद है। रत्नागिरी प्रोजेक्ट को दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल सुविधाओं में से एक बनना था, लेकिन प्रोजेक्ट में देरी से सप्लाई गैप बढ़ सकता है या फिर इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भरता बढ़ सकती है।
दूसरे रिफाइनरी प्रोजेक्ट्स आगे बढ़ रहे हैं
जहां रत्नागिरी प्रोजेक्ट थम गया है, वहीं दूसरे बड़े रिफाइनरी प्रोजेक्ट्स तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जो रणनीतिक फोकस में बदलाव का संकेत देते हैं। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) अपनी आय के स्रोतों को बढ़ाने के लिए गुजरात में ₹1 लाख करोड़ की लागत से 120 लाख टन प्रति वर्ष (mmtpa) की एक नई रिफाइनरी लगाने की योजना बना रहा है। इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) BPCL के आंध्र प्रोजेक्ट और ONGC के गुजरात वेंचर दोनों के लिए फिजिबिलिटी स्टडी कर रहा है। इन बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों की ज़रूरत बनी हुई है, खासकर कैपिटल और तकनीकी विशेषज्ञता हासिल करने के लिए।
वैल्यूएशन का अंतर और एग्जीक्यूशन का जोखिम
विशेषज्ञों का मानना है कि RRPCL जैसे बड़े प्रोजेक्ट भविष्य की मांग को पूरा करने के लिए वैचारिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके एग्जीक्यूशन (पूरा होने) का जोखिम काफी बढ़ गया है। रत्नागिरी में लगातार देरी से Saudi Aramco और Adnoc जैसे पार्टनर्स के लिए रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) पर सीधा असर पड़ रहा है, जो उन्हें कैपिटल एलोकेशन की रणनीतियों पर फिर से विचार करने पर मजबूर कर रहा है। कंपनियाँ अब उन प्रोजेक्ट्स को ज़्यादा पसंद कर रही हैं जहाँ ज़मीन का टाइटल साफ हो, लॉजिस्टिक्स बेहतर हो और प्रोजेक्ट जल्दी पूरा हो सके।
बदलती परिस्थितियाँ और प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता
Adnoc का हटना और Saudi Aramco का समीक्षा करना RRPCL प्रोजेक्ट के लिए केवल एक घटना नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा निवेश के बदलते रुझानों का संकेत है। बड़े मेगा-रिफाइनरी प्रोजेक्ट्स, खासकर ज़मीन अधिग्रहण की लंबी लड़ाई लड़ रहे प्रोजेक्ट्स, काफी कैपिटल फंसा देते हैं जिनका रिटर्न अनिश्चित होता है। इससे निवेशकों के लिए जोखिम बहुत बढ़ जाता है, क्योंकि कैपिटल को उन जगहों पर ज़्यादा प्रभावी ढंग से लगाया जा सकता है जहाँ रेगुलेटरी प्रक्रियाएँ सरल हों। इसके अलावा, दुनिया भर में ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ता झुकाव भी फाइनेंसर्स को RRPCL जैसे लंबे समय तक चलने वाले, कैपिटल-इंटेंसिव फॉसिल फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर में पैसा लगाने से हिचकिचा सकता है, खासकर जब देश में ही एग्जीक्यूशन की चुनौतियाँ हों।
भविष्य की राह: बेहतर योजना और साझेदारी
भारत की रिफाइनिंग क्षमता में आगे विस्तार होने की उम्मीद है, क्योंकि सरकार घरेलू मांग को पूरा करने और एक्सपोर्ट की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण विस्तार का लक्ष्य रखती है। इंडस्ट्री के अनुमानों के अनुसार, पेट्रोकेमिकल्स की मांग में लगातार वृद्धि जारी रहेगी, जिसका मुख्य कारण पैकेजिंग, ऑटोमोटिव और कंस्ट्रक्शन जैसे क्षेत्र हैं। हालांकि, भविष्य के प्रोजेक्ट्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे ज़मीन अधिग्रहण जैसी बाधाओं को कितनी कुशलता से पार करते हैं और कितनी मजबूत अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी हासिल करते हैं। आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे प्रोजेक्ट्स, जो लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक फायदे पेश करते हैं, महाराष्ट्र की अटकी हुई पहलों की तुलना में अधिक सफल हो सकते हैं।