सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर सब्सिडी का भारी बोझ है, हर LPG सिलेंडर पर उन्हें **₹690** का नुकसान हो रहा है। अब सरकार शहरी इलाकों में ग्राहकों को पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) पर शिफ्ट करने का दबाव बना रही है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो और सब्सिडी का खर्च काबू में रहे।
सब्सिडी का जाल और वित्तीय दबाव
सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियाँ (OMCs) इस समय एक मुश्किल वित्तीय दौर से गुजर रही हैं। LPG की पारंपरिक रिटेल बिक्री अब उनके मुनाफे को लगातार कम कर रही है। पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की ओर तेजी से कदम बढ़ाने का फैसला कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक बड़ी जरूरत बन गया है। सरकार सालाना ₹1.38 लाख करोड़ से ज्यादा के सब्सिडी घाटे को कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है। पश्चिम एशिया में ऊर्जा की अस्थिरता को देखते हुए, एक बड़े और लॉजिस्टिक्स-भारी LPG सप्लाई चेन को बनाए रखना अब आर्थिक रूप से सही नहीं बैठ रहा। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियाँ इस समय सिलेंडर पर इतना ज्यादा सब्सिडी दे रही हैं कि मौजूदा इंपोर्ट पैरिटी कॉस्ट के मुकाबले रिटेल प्राइसिंग मॉडल टिकाऊ नहीं रह गया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी
हालांकि PNG में बदलाव का निर्देश स्पष्ट है, लेकिन इसका लागू होना शहरी पाइपलाइन बिछाने की रफ्तार पर निर्भर करेगा। इंद्रप्रस्थ गैस और महानगर गैस जैसी सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों को एक तरह से नया मार्केट मिल रहा है। लेकिन, यह बदलाव स्थानीय स्तर पर काफी मुश्किल साबित हो रहा है। घनी आबादी वाले इलाकों में मौजूदा घरों में पाइपलाइन फिट करने की लॉजिस्टिकल चुनौती, ग्राहकों की सुस्ती, मकान मालिक-किराएदार के झगड़े और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर की अपनी सीमाएं इसे और पेचीदा बना रही हैं। सरकार ने पाइपलाइन विस्तार के लिए रेगुलेटरी अप्रूवल को घटाकर 10 दिन का कर दिया है, लेकिन असली चुनौती अभी भी बाकी है। एक पोर्टेबल फ्यूल सोर्स से एक स्टैटिक यूटिलिटी मॉडल में बदलाव के लिए एक सांस्कृतिक और फिजिकल शिफ्ट की जरूरत है, जिसे मौजूदा स्पीड से हासिल करना मुश्किल लग रहा है।
निवेश के लिए जोखिम भरे संकेत
निवेशकों को इस बदलाव से होने वाले तत्काल मुनाफे पर शक करना चाहिए। इस शिफ्ट में दो बड़े जोखिम शामिल हैं। पहला, OMCs अपने पारंपरिक डाउनस्ट्रीम ऑपरेशन्स में बड़े पैमाने पर नुकसान का सामना करेंगी, जिसका असर उनके बड़े ऑपरेशन्स को सहारा देने वाले हाई-वॉल्यूम रिटेल नेटवर्क पर पड़ सकता है। दूसरा, CGD कंपनियाँ, भले ही सरकारी मदद से ग्रोथ कर रही हों, लेकिन वे खुद मार्जिन दबाव का सामना कर रही हैं। सेक्टर की हालिया गिरावट बाजार की गहरी शंका को दर्शाती है। जैसे-जैसे सरकार द्वारा आवंटित सस्ती डोमेस्टिक गैस (APM) की सप्लाई कम हो रही है, CGD कंपनियों को अनिवार्य मांग को पूरा करने के लिए महंगी स्पॉट LNG खरीदनी पड़ रही है। अगर इन इनपुट्स की लागत बढ़ती रही, तो यह जबरन माइग्रेशन OMCs के स्तर पर सब्सिडी की समस्या को डिस्ट्रीब्यूशन लेवल पर मार्जिन क्रंच संकट में बदल सकता है।
रेगुलेटरी एक्शन और भविष्य का आउटलुक
PNG-रेडी इलाकों में 2026 तक LPG कनेक्शन बंद करने का फरमान ग्राहकों की हिचकिचाहट को दूर करने का एक सीधा तरीका है। घरों में गैस सप्लाई को रेगुलेटरी कंप्लायंस से जोड़कर, सरकार एक ऐसे मार्केट ट्रांसफॉर्मेशन को मजबूर करने की कोशिश कर रही है जो अकेले इकोनॉमिक्स से संभव नहीं हो पाया। आगे की रणनीति 2034 तक 12 करोड़ कनेक्शन का लक्ष्य हासिल करने की है, लेकिन बाजार के प्रतिभागी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के गैस सोर्सिंग मिक्स पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। इन कंपनियों की मजबूती इस बात पर निर्भर करेगी कि वे इनपुट लागतों को कैसे मैनेज कर पाती हैं, खासकर ऐसे समय में जब ऊर्जा सुरक्षा, कॉस्ट-एफिशिएंसी से ज्यादा अहम पॉलिसी ड्राइवर बन गई है।
