भारत ने अपने पावर ग्रिड की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) को **2030** तक विदेशी SCADA सिस्टम को स्वदेशी तकनीक से बदलने का निर्देश दिया है। वर्तमान में ग्रिड मैनेजमेंट के लिए **80%** विदेशी तकनीक पर निर्भरता को कम करना इस कदम का मुख्य लक्ष्य है।
भारत अब अपने राष्ट्रीय पावर ग्रिड मैनेजमेंट तकनीक का कायापलट करने जा रहा है। सरकार ने सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) को यह स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 2030 तक विदेशी Supervisory Control and Data Acquisition (SCADA) सिस्टम को हटाकर स्वदेशी टेक्नोलॉजी को अपनाया जाए। ये सिस्टम देश के पावर ग्रिड के 'नर्वस सिस्टम' की तरह काम करते हैं, जो बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण की हर गतिविधि को कंट्रोल करते हैं।
क्यों लिया गया यह कदम?
फिलहाल भारत अपने ग्रिड के लिए 80% से ज्यादा विदेशी तकनीक पर टिका है। इसे एक बड़ी रणनीतिक कमजोरी माना जा रहा है। सप्लाई चेन की दिक्कतें और साइबर-सुरक्षा के बढ़ते खतरों को देखते हुए सरकार अब पूरी तरह 'आत्मनिर्भर' होने की दिशा में बढ़ रही है ताकि भविष्य में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या जियो-पॉलिटिकल अस्थिरता से ग्रिड को बचाया जा सके।
3 साल का रोडमैप और चुनौतियां
CEA ने 2026-27 से 2028-29 के लिए एक विस्तृत रोडमैप तैयार किया है। इस प्लान में 38 सॉफ्टवेयर मॉड्यूल और 25 हार्डवेयर कंपोनेंट्स को स्वदेशी तरीके से विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार इसके लिए एक 'नेशनल SCADA मिशन' बनाने पर भी विचार कर रही है, जो पब्लिक सेक्टर और घरेलू टेक कंपनियों के साथ मिलकर इसे स्केल करेगा।
शुरुआत में, पायलट प्रोजेक्ट्स के तौर पर इसे राज्य स्तरीय लोड डिस्पैच सेंटर्स (SLDCs) में टेस्ट किया जाएगा। हालांकि, यह काम इतना आसान नहीं है। 'स्टेट एस्टिमेटर्स' और 'ऑटोमैटिक जनरेशन कंट्रोल' जैसे जटिल फंक्शन फिलहाल विदेशी सॉफ्टवेयर पर निर्भर हैं। इन्हें हूबहू कॉपी करना और वैसी ही परफॉर्मेंस देना एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती होगी। माइग्रेशन के दौरान साइबर रिस्क और ऑपरेशनल रुकावटों को मैनेज करना भी सरकार और कंपनियों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।
