भारत ने सितंबर में रूस से कच्चे तेल का आयात घटाकर **1.75 मिलियन बैरल** प्रतिदिन कर दिया है, जो पांच महीने का निचला स्तर है। जियोपॉलिटिकल रिस्क कम करने के लिए अब भारतीय रिफाइनर्स इराक और सऊदी अरब जैसे देशों का रुख कर रहे हैं, जिससे निवेशकों की नजर रिफाइनिंग मार्जिन पर टिकी है।
भारत की रूस से तेल खरीदने की रणनीति में सितंबर महीने में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अगस्त में यह आंकड़ा 2.02 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, जो अब घटकर 1.75 मिलियन बैरल रह गया है। हालांकि भारत अब भी रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार है, लेकिन सप्लाई चेन के जोखिमों को कम करने के लिए कंपनियां अब अपने पुराने पार्टनर्स की ओर वापस लौट रही हैं।
मिडल ईस्ट की ओर झुकाव
रूस पर निर्भरता कम करने के लिए भारतीय तेल कंपनियों ने इराक और सऊदी अरब से आयात बढ़ाया है। अब इराक से आयात बढ़कर 575,000 बैरल प्रतिदिन और सऊदी अरब से 566,000 बैरल प्रतिदिन पहुंच गया है। इस कदम से रिफाइनरीज को फीडस्टॉक की निरंतर सप्लाई सुनिश्चित करने में मदद मिल रही है।
रिफाइनिंग मार्जिन और प्रॉफिट का गणित
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है Gross Refining Margins (GRM)। अब तक भारी डिस्काउंट पर मिलने वाले रूसी तेल से रिफाइनर्स का मुनाफा बढ़ रहा था। यदि मिडल ईस्ट से आने वाला तेल महंगा पड़ता है और रिफाइनर्स इस लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाते हैं, तो आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मुनाफे पर दबाव देखने को मिल सकता है। IOCL, BPCL, HPCL और Reliance Industries जैसे शेयरों के लिए यह एक प्रमुख 'वॉच-आउट' फैक्टर है।
घरेलू डिमांड में दम
सप्लाई के मोर्चे पर बदलाव के बावजूद, भारत का कुल कच्चा तेल इनटेक सितंबर में 5.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले महीने के मुकाबले 600,000 बैरल अधिक है। देश में ईंधन की मजबूत मांग के चलते रिफाइनरीज पूरी क्षमता से काम कर रही हैं। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या रिफाइनर्स अपनी प्रॉफिटेबिलिटी को बनाए रखने में कामयाब हो पाएंगे या नहीं।
