भारत का ग्रीन पावर लॉस: ग्रिड की मार झेल रहा रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत का ग्रीन पावर लॉस: ग्रिड की मार झेल रहा रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर
Overview

भारत में 2026 की पहली तिमाही में करीब **300 GWh** रिन्यूएबल एनर्जी का नुकसान हुआ है। वजह? देश का पावर ग्रिड जनरेट हुई बिजली को संभाल नहीं पा रहा। खासकर नॉर्दर्न रीजन में यह ट्रांसमिशन की दिक्कतें ज्यादा देखी गईं। यह समस्या दिखाती है कि नए ग्रीन एनर्जी सोर्स जोड़ने और ग्रिड को अपग्रेड करने के बीच एक बड़ी खाई है। बैटरी स्टोरेज को इसका एक संभावित समाधान माना जा रहा है।

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ग्रिड पर दबाव से रिन्यूएबल एनर्जी को बड़ा झटका

साल 2026 की पहली तिमाही में भारत ने लगभग 300 गीगावाट-घंटा (GWh) रिन्यूएबल एनर्जी का भारी नुकसान झेला है। यह नुकसान, जिसे 'कर्टेलमेंट' भी कहा जाता है, इसलिए हुआ क्योंकि इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड जनरेट हुई सारी क्लीन पावर को ट्रांसमिट नहीं कर सका। कुल 470 GWh ग्रीन एनर्जी उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच सकी, जिसमें ट्रांसमिशन की बाधाएं मुख्य कारण रहीं।

सबसे ज्यादा असर नॉर्दर्न रीजन में देखा गया, जहां 178 GWh ग्रीन बिजली का उपयोग नहीं हो सका। वेस्टर्न रीजन में भी 122 GWh का नुकसान हुआ। वहीं, सदर्न ग्रिड अपनी जनरेट की हुई सारी रिन्यूएबल पावर पहुंचाने में कामयाब रहा, जो वहां की बेहतर ग्रिड इंटीग्रेशन का संकेत देता है।

रिन्यूएबल ग्रोथ के मुकाबले इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट धीमा

यह समस्या भारत की तेजी से बढ़ती रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के धीमे विकास के बीच बढ़ती खाई का नतीजा है। पिछले पांच सालों में, देश अपने सालाना ट्रांसमिशन सिस्टम को अपग्रेड करने के टारगेट का सिर्फ 80% ही पूरा कर पाया है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम की मांग काफी बढ़ गई है, जिसके लिए 25,146 सर्किट किलोमीटर नई लाइनों की जरूरत है। यह लक्ष्य पिछले प्रदर्शन को देखते हुए चुनौतीपूर्ण लग रहा है।

प्रोजेक्ट्स में देरी ने बढ़ाई ग्रिड की दिक्कतें

समस्या को और बढ़ाने वाली बात यह है कि कई बड़े ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स में काफी देरी हो रही है। हर चार बड़े ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स में से एक कम से कम एक साल पीछे चल रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर के इस समय पर विकास न होने का मतलब है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए प्लान की गई लगभग 20 गीगावाट (GW) रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को चार महीने से ज्यादा समय तक कनेक्शन की समस्या झेलनी पड़ सकती है। इससे और ज्यादा पावर कर्टेल होगी और डेवलपर्स को राजस्व का नुकसान होगा।

बैटरी स्टोरेज से मिलेगा समाधान?

एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) इन नुकसानों को कम करने का एक व्यावहारिक तरीका हो सकता है। अनुमान है कि 3-4 GW की बैटरी स्टोरेज क्षमता, जो हर एक 2 घंटे चार्ज रख सकती है, पहली तिमाही में कर्टेल हुई पावर का एक बड़ा हिस्सा सोख सकती थी। भारत में बैटरी स्टोरेज की अपार संभावनाएं हैं, जिसमें प्रमुख पावर कनेक्शन पॉइंट्स पर 236 GW की क्षमता उपलब्ध है।

बैटरी स्टोरेज लागू करने में चुनौतियां

तकनीकी रूप से संभव होने के बावजूद, बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज को लागू करने में रेगुलेटरी और कमर्शियल बाधाएं आ रही हैं। इन्हें दूर करने के लिए, कुछ प्रस्तावों में एक सरकारी इकाई बनाना शामिल है जो ग्रिड की अस्थायी समस्याओं का सामना कर रहे प्रोजेक्ट्स से रिन्यूएबल पावर खरीदेगी। यह इकाई फिर इस पावर को बैटरी स्टोरेज डेवलपर्स को कॉन्ट्रैक्ट पर दे सकती है। इसके अलावा, बैटरी स्टोरेज को एक ट्रांसमिशन एसेट की तरह मानने से विभिन्न राज्यों के बीच लागत साझा की जा सकती है, जिससे ट्रांसमिशन लाइनों के मौजूदा पेमेंट स्ट्रक्चर के अनुरूप निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.