Solar Energy Sector: भारत में सोलर मैन्युफैक्चरिंग का बोलबाला, लेकिन US के नए 'टैरिफ वॉर' से बढ़ी टेंशन

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AuthorMehul Desai|Published at:
Solar Energy Sector: भारत में सोलर मैन्युफैक्चरिंग का बोलबाला, लेकिन US के नए 'टैरिफ वॉर' से बढ़ी टेंशन

साल 2026 की दूसरी तिमाही में ग्लोबल सोलर मैन्युफैक्चरिंग इन्वेस्टमेंट का **48%** हिस्सा भारत में आया है। हालांकि, अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी-भरकम आयात शुल्क (Import Duties) और कच्चे माल की विदेश पर निर्भरता भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।

ग्लोबल मार्केट में भारत की धाक

भारत अब सोलर मैन्युफैक्चरिंग का नया हब बनकर उभरा है। 2026 की दूसरी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में सोलर सेक्टर में हुए कुल निवेश का लगभग आधा हिस्सा भारत में आया है। चीन में ओवरकैपेसिटी और गिरती कीमतों के कारण कम हुए निवेश का सीधा फायदा भारत को मिला है, जिसने मैन्युफैक्चरिंग के मामले में अपनी स्थिति मजबूत की है।

अमेरिका के टैरिफ से बढ़ा रिस्क

निवेश तो बढ़ा है, लेकिन भारतीय कंपनियों के सामने सबसे बड़ा संकट 'एक्सपोर्ट' का है। सितंबर 2026 में अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारतीय सोलर सेल्स और पैनल्स पर 249% से अधिक का एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगा दिया है। यह कदम भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका में अपना माल बेचना नामुमकिन जैसा बना रहा है। अब निवेशकों की नजरें 14 अक्टूबर, 2026 को होने वाले US इंटरनेशनल ट्रेड कमीशन के फैसले पर टिकी हैं, जो इस ट्रेड पॉलिसी का भविष्य तय करेगा।

सप्लाई चेन और मार्जिन पर दबाव

सिर्फ एक्सपोर्ट ही नहीं, घरेलू स्तर पर भी चुनौती कम नहीं है। इंडस्ट्री में 'डाउनस्ट्रीम सैचुरेशन' का खतरा बढ़ गया है, यानी जरूरत से ज्यादा कैपेसिटी बनने से सप्लाई बढ़ेगी, जो कीमतों और मुनाफे को दबा सकती है। इसके अलावा, भारत अभी भी पॉलिसिलिकॉन (Polysilicon) और सिलिकॉन वेफर्स जैसे जरूरी कच्चे माल के लिए विदेशों पर निर्भर है। सरकार की PLI स्कीम के बावजूद, अगर ग्लोबल सप्लाई चेन में दिक्कत आती है या कच्चे माल की कीमतें बढ़ती हैं, तो मैन्युफैक्चरर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर तगड़ी चोट पड़ सकती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.