भारत सरकार ने **₹84,084 करोड़** की 'समुद्र मंथन' पहल शुरू की है। इसके तहत अब डीपवॉटर तेल खोज के लिए हर महीने बिडिंग होगी और सरकार खोज में आने वाले खर्च का **50%** तक वहन करेगी।
भारत सरकार ने देश में तेल और गैस उत्पादन को रफ्तार देने के लिए ₹84,084 करोड़ के मेगा प्लान 'समुद्र मंथन' का ऐलान किया है। इस नीति में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब वार्षिक लाइसेंसिंग साइकिल की जगह ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (OALP) के तहत हर महीने बिडिंग विंडो खुलेगी। यानी साल में 12 बार तेल कंपनियों को गहरे समुद्र में खोज के लिए मौके मिलेंगे।
खोज की राह अब आसान
गहरे समुद्र में ड्रिलिंग करना बेहद महंगा और जोखिम भरा काम है। इसी जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने नई शर्तें लागू की हैं:
- एक्सप्लोरेटरी वेल: सरकार खोज की लागत का 50% कवर करेगी, जिसकी सीमा ₹675 करोड़ प्रति कुआं तय की गई है।
- स्ट्रेटिग्राफिक वेल: डेटा जुटाने के लिए खोदे जाने वाले कुओं पर 100% तक का खर्च सरकार उठाएगी, जिसकी सीमा ₹1,350 करोड़ है।
बिडिंग के नए नियम
सरकार ने बिडिंग के तरीकों में भी बड़ा बदलाव किया है। अब बोली लगाने वालों का चयन 'रेवेन्यू शेयरिंग' के बजाय उनके 'कमिटेड वर्क प्रोग्राम' (तकनीकी क्षमता और अनुभव) के आधार पर होगा। इससे तकनीकी रूप से सक्षम कंपनियां आगे आएंगी और प्रोजेक्ट्स में देरी कम होगी।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
ONGC और Oil India जैसी कंपनियों के लिए यह एक बड़ा 'डी-रिस्किंग' कदम है। यदि कोई कुआं सूखा निकलता है, तो सरकार द्वारा दी गई आर्थिक मदद वापस नहीं लेनी होगी, जिससे कंपनियों का बैलेंस शीट सुरक्षित रहेगा। हालांकि, निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें और भौगोलिक अनिश्चितताएं अभी भी सेक्टर के लिए बड़े रिस्क बनी हुई हैं। अब बाजार की नजर इस बात पर होगी कि कंपनियां इन नई बिडिंग विंडो का कितना तेजी से इस्तेमाल करती हैं।
