मानसून में **13-15%** की कमी के चलते भारत में हाइड्रो पावर जनरेशन लगातार पांच महीनों से गिर रहा है। बिजली की कमी को पूरा करने के लिए कंपनियां अब थर्मल पावर पर निर्भर हैं, जिससे सेक्टर पर लागत का भारी दबाव बढ़ गया है।
भारत का पावर सेक्टर इस समय एक कठिन दौर से गुजर रहा है। साल 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून में 13-15% की कमी दर्ज की गई है, जो पिछले एक दशक का सबसे खराब प्रदर्शन है। बारिश की कमी के कारण जलाशयों (Reservoirs) का जलस्तर काफी नीचे चला गया है, जिससे सितंबर 2026 तक लगातार 5 महीनों से हाइड्रो पावर जनरेशन में गिरावट देखने को मिल रही है।\n\n### थर्मल पावर की बढ़ती भूमिका\nपानी की किल्लत के कारण देश का पूरा जोर अब कोयले पर आधारित थर्मल पावर पर शिफ्ट हो गया है। केवल सितंबर महीने में ही थर्मल पावर जनरेशन में पिछले साल के मुकाबले 18% की जबरदस्त तेजी आई है। बिजली की मांग इतनी अधिक है कि रात के समय कमी 7.7 GW तक पहुंच गई है, जो गर्मी के पीक सीजन से भी ज्यादा है। इस अचानक शिफ्ट से कोल लॉजिस्टिक्स पर दबाव बढ़ा है और कई प्लांट्स में कोयले का स्टॉक कम होने लगा है।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है स्थिति?\nयह स्थिति निवेशकों के लिए एक जटिल फाइनेंशियल एनवायरनमेंट तैयार कर रही है। जो कंपनियां केवल हाइड्रो पावर पर निर्भर हैं, उनके मुनाफे पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। हालांकि, पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन के जरिए कुछ कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। उदाहरण के लिए, NHPC ने अपने वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में 7.22% की रेवेन्यू ग्रोथ दिखाई है, जिसका मुख्य कारण नए प्रोजेक्ट्स का शुरू होना रहा।\n\nअब बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पावर एक्सचेंज में बिजली की बढ़ती कीमतों और जलाशयों के स्तर में सुधार न होने का असर सेक्टर के ऑपरेटिंग मार्जिन पर कितना गहरा पड़ता है।
