भारत अब सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। देश ने इसमें **52%** रेडीनेस स्कोर हासिल कर लिया है, जबकि सरकार ने **2030** तक **5%** फ्यूल ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा है।
भारत का एविएशन सेक्टर अब ग्रीन एनर्जी की ओर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। Boeing और Roundtable on Sustainable Biomaterials की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) को अपनाने में 52% तैयारी पूरी कर ली है।
सरकार का रोडमैप क्या है?
सरकार ने इस दिशा में स्पष्ट टाइमलाइन तय की है। इसके तहत 2027 में 1%, 2028 में 2% और 2030 तक 5% ब्लेंडिंग का अनिवार्य लक्ष्य रखा गया है। यह कदम कार्बन उत्सर्जन कम करने के अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ तालमेल बिठाने के लिए उठाया गया है।
असली चुनौती कहां है?
सैद्धांतिक रूप से भले ही संभावनाएं बड़ी हों, लेकिन इसे जमीन पर उतारना बड़ी चुनौती है। अनुमान है कि 2030 तक देश में सालाना 720 मिलियन लीटर SAF की मांग होगी। इसके लिए इस्तेमाल हो चुके कुकिंग ऑयल और कृषि अपशिष्ट (agricultural waste) की निरंतर सप्लाई सुनिश्चित करना और इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना सबसे बड़ी बाधा है।
ऑयल कंपनियों पर असर
इस बदलाव के लिए Indian Oil Corporation (IOCL), Bharat Petroleum (BPCL) और Hindustan Petroleum (HPCL) जैसी सरकारी तेल कंपनियों को रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने के लिए भारी निवेश करना होगा। निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता SAF और पारंपरिक जेट फ्यूल के बीच की कीमत का अंतर है। अगर प्रोडक्शन कॉस्ट ज्यादा रहती है, तो इसका असर एयरलाइंस के टिकट प्राइज पर पड़ सकता है। फिलहाल, सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि सरकार लागत के इस अंतर को पाटने के लिए क्या मैकेनिज्म तैयार करती है।
