Green Hydrogen Sector: क्या भारत का ग्रीन हाइड्रोजन सपना अटकेगा? इंफ्रास्ट्रक्चर की राह में बड़ी चुनौतियां

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AuthorMehul Desai|Published at:
Green Hydrogen Sector: क्या भारत का ग्रीन हाइड्रोजन सपना अटकेगा? इंफ्रास्ट्रक्चर की राह में बड़ी चुनौतियां

भारत का Green Hydrogen सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर और लागत की भारी चुनौतियां इसके लिए नई मुश्किल बन सकती हैं। कंपनियों के बड़े निवेश के बावजूद, अब फोकस पोर्ट रेडीनेस और लंबी अवधि के समझौतों पर शिफ्ट करना जरूरी है।

भारत का लक्ष्य ग्लोबल ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन में लीडर बनने का है, लेकिन फिलहाल यह सेक्टर कुछ व्यावहारिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिन्हें निवेशकों को गंभीरता से देखना चाहिए। Reliance Industries, Adani Green Energy, Larsen & Toubro और NTPC जैसी दिग्गज कंपनियों ने इलेक्ट्रोलाइजर क्षमता बढ़ाने की योजनाएं घोषित की हैं, लेकिन प्लांट खड़ा करना सिर्फ एक शुरुआत है। शेयरहोल्डर्स के लिए असली कहानी सप्लाई चेन, पावर ग्रिड इंटीग्रेशन और प्रोजेक्ट इकोनॉमिक्स को मैनेज करने में छिपी है।

प्राइस कम्पटीशन और लागत की बाधा

सबसे बड़ी चुनौती ग्रीन हाइड्रोजन को सस्ता बनाना है। अभी 'ग्रे हाइड्रोजन' (जीवाश्म ईंधन से बनने वाली हाइड्रोजन) के मुकाबले ग्रीन हाइड्रोजन की लागत काफी अधिक है। इसके लिए केवल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी ही नहीं, बल्कि रिन्यूएबल बिजली की स्थिर सप्लाई के लिए ग्रिड में भारी निवेश की जरूरत है। यदि लागत कम नहीं होती, तो स्टील और फर्टिलाइजर जैसे औद्योगिक खरीदारों का पारंपरिक ईंधन से ग्रीन विकल्प पर स्विच करना मुश्किल होगा।

लॉजिस्टिक्स का बड़ा अड़ंगा

प्रोडक्शन के अलावा, लॉजिस्टिक्स सेक्टर में एक बड़ा 'बॉटलनेक' है। ग्रीन हाइड्रोजन को अमोनिया में बदलकर एक्सपोर्ट करने के लिए विशेष पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। फिलहाल, भारतीय पोर्ट्स पर ऐसी सुविधाओं का अभाव है जो इन डेरिवेटिव्स को सुरक्षित और बड़े पैमाने पर हैंडल कर सकें। यह लॉजिस्टिक गैप उन कंपनियों के लिए जोखिम भरा है, जो इंटरनेशनल मार्केट को टारगेट कर रही हैं।

ऑफटेक एग्रीमेंट्स का महत्व

निवेशकों के लिए एक और अहम पहलू 'लॉन्ग-टर्म ऑफटेक एग्रीमेंट्स' है। ये ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स हैं जिनमें खरीदार कई वर्षों तक निश्चित मात्रा में हाइड्रोजन खरीदने की गारंटी देता है। ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स में शुरुआती खर्च बहुत ज्यादा होता है और मुनाफा कमाने में लंबा समय लगता है। ऐसे में वित्तीय स्थिरता के लिए ये एग्रीमेंट्स रीढ़ की हड्डी हैं। अगर ये नहीं हुए, तो डिमांड और कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर कंपनी की बैलेंस शीट पर दिखेगा।

आने वाले समय में निवेशकों को यह देखना होगा कि सरकार और प्राइवेट सेक्टर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कैसे तालमेल बैठाते हैं। पोर्ट प्रोजेक्ट्स की प्रोग्रेस और औद्योगिक सेक्टर द्वारा लंबे समय के खरीद समझौतों पर साइन करना इस सेक्टर की अगली बड़ी 'ट्रिगर' साबित होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.