भारत ने साल 2019 से 2024 के बीच ग्रीन एनर्जी रिसर्च के लिए **₹1,443 करोड़** का भारी-भरकम फंड जारी किया, लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा सिर्फ लैबोरेटरी प्रोजेक्ट्स तक सिमट कर रह गया है।
भारत में पिछले 5 सालों में ₹1,443 करोड़ की लागत से 1,350 से ज्यादा क्लीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स पर रिसर्च की गई है। लेकिन एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, यह निवेश बड़े पैमाने पर घरेलू मैन्युफैक्चरिंग (Domestic Manufacturing) में बदलने में नाकाम रहा है। सारा पैसा लैब-स्टेज रिसर्च में खर्च हो गया, जबकि असली जरूरत 'पायलट प्लांट्स' और बड़ी फैक्ट्रियां लगाने की थी।
लैब से मार्केट तक का सफर क्यों है मुश्किल?
इंडस्ट्री में इसे 'वैली ऑफ डेथ' (Valley of Death) कहा जाता है। इसका मतलब है कि कोई टेक्नोलॉजी लैब में तो सफल हो जाती है, लेकिन उसे मास प्रोडक्शन (Mass Production) के लेवल तक ले जाने में लगने वाली भारी लागत और जटिलता के कारण वह वहीं अटक जाती है। सोलर एनर्जी सेक्टर को सबसे ज्यादा ₹401 करोड़ की फंडिंग मिली, लेकिन रिसर्च के बावजूद हम सोलर वेफर और बैटरी सेल्स जैसे जरूरी कंपोनेंट्स के लिए आज भी दूसरे देशों पर निर्भर हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
क्लीन एनर्जी सेक्टर में दांव लगाने वाले निवेशकों को यह समझना होगा कि सिर्फ रिसर्च काफी नहीं है। जब तक देश में कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग नहीं बढ़ेगी, भारतीय कंपनियां ग्लोबल सप्लाई चेन और कच्चे माल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव (Price Fluctuations) के आगे कमजोर बनी रहेंगी।
हालांकि, सरकार की PLI (Production Linked Incentive) स्कीम इस गैप को भरने की कोशिश कर रही है, लेकिन असली मुनाफा उन्हीं कंपनियों का होगा जो केवल असेंबली (Assembly) से आगे बढ़कर पूरी तरह से स्वदेशी कंपोनेंट बनाने में सफल होंगी। आने वाले समय में कंपनियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी जल्दी अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी को इंडस्ट्रियल स्केल पर ले जाती हैं।
