सरकार ने ₹1.86 लाख करोड़ के Green Energy Corridor Phase III का ऐलान कर दिया है। इस प्रोजेक्ट का मकसद ट्रांसमिशन नेटवर्क को मॉडर्न बनाना और बैटरी स्टोरेज क्षमता को बढ़ाकर रिन्यूएबल एनर्जी की सप्लाई को स्टेबल करना है।
भारत सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी Green Energy Corridor के तीसरे चरण (Phase III) का आगाज किया है। ₹1.86 लाख करोड़ की लागत वाली इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य उन दूर-दराज के इलाकों को मुख्य ग्रिड से जोड़ना है जहां रिन्यूएबल एनर्जी का उत्पादन होता है। मौजूदा ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करके सरकार विंड और सोलर एनर्जी की बर्बादी को कम करना चाहती है, जो अक्सर सप्लाई ज्यादा होने के कारण ग्रिड में सही से नहीं पहुंच पाती।
ग्रिड की मजबूती और बैटरी स्टोरेज पर फोकस
इस फेज की सबसे खास बात है 'बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम' (BESS) का इस्तेमाल। ये सिस्टम बफर के रूप में काम करेंगे, जो अधिक बिजली उत्पादन होने पर उसे स्टोर करेंगे और जरूरत पड़ने पर ग्रिड में छोड़ेंगे। यह कदम भौतिक ट्रांसमिशन लाइनों से हटकर एक डिजिटल और स्मार्ट एनर्जी नेटवर्क बनाने की दिशा में एक बड़ी छलांग है।
किन सेक्टरों में दिखेगी हलचल?
निवेशकों के नजरिए से यह खबर पावर ट्रांसमिशन और इंजीनियरिंग कंपनियों के लिए बड़ी संभावना लेकर आई है। Power Grid Corporation of India (PGCIL) जैसी कंपनियां, जो बड़े पैमाने पर ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स को अंजाम देती हैं, इस पूरे निवेश का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकती हैं। इसके अलावा, EPC (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) क्षेत्र की कंपनियों और घरेलू उपकरण निर्माताओं को भी बड़े ऑर्डर मिलने की उम्मीद है।
जोखिम और चुनौतियां
इतने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में जोखिम भी कम नहीं होते। सेक्टर की सबसे बड़ी बाधा राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) की माली हालत है। अगर डिस्काम की वित्तीय स्थिति कमजोर रही, तो पेमेंट साइकिल और इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड में देरी हो सकती है। इसके अलावा, रेगुलेटरी क्लीयरेंस और प्रोजेक्ट के लागत में होने वाली वृद्धि (Cost Overruns) पर निवेशकों को नजर रखनी होगी। प्रोजेक्ट्स के टेंडर और उनके कमीशनिंग की रफ्तार ही यह तय करेगी कि कंपनियों के लिए यह कितना फायदेमंद साबित होगा।
