साल 2026 में भारत की नेचुरल गैस की मांग **2%** घटने का अनुमान है। हालांकि देश ने LNG इम्पोर्ट में **10%** की बढ़ोतरी की है, लेकिन 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के बंद होने से सप्लाई चेन बाधित है और कीमतें आसमान छू रही हैं।
भारत का एनर्जी सेक्टर साल 2026 में एक कठिन दौर से गुजर रहा है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, देश में नेचुरल गैस की कुल मांग में 2% की कमी आने की आशंका है। यह गिरावट तब देखने को मिल रही है जब भारत ने सप्लाई बढ़ाने के लिए लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के इम्पोर्ट में 10% या करीब 3 बिलियन क्यूबिक मीटर का इजाफा किया है। यह अंतर देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और सस्ती सप्लाई की कमी को दर्शाता है।
सप्लाई में बाधा और बढ़ती कीमतें
बाजार पर इस दबाव की मुख्य वजह 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' का बंद होना है, जो एनर्जी शिपमेंट के लिए एक महत्वपूर्ण रास्ता है। इस भू-राजनीतिक संकट ने कतर और यूएई जैसे बड़े एक्सपोर्टर्स से LNG सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। ग्लोबल सप्लाई चेन के टाइट होने से गैस की कीमतों में भारी उछाल आया है। सितंबर 2026 में स्पॉट टेंडर की कीमतें $26.4 प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (MMBtu) तक पहुंच गईं, जो कि साल की शुरुआत में $16.8 से $18.8 के दायरे में थीं।
अलग-अलग इंडस्ट्रीज पर असर
सीमित गैस उपलब्धता को मैनेज करने के लिए भारत ने 'टियर्ड डिमांड-मैनेजमेंट' (Tiered demand-management) रणनीति अपनाई है। सरकार ने सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों को प्राथमिकता दी है ताकि घरों और कमर्शियल वाहनों तक गैस पहुंचती रहे। हालांकि, इसका खामियाजा फर्टिलाइजर प्लांट्स, रिफाइनरीज और सामान्य इंडस्ट्रियल सेक्टर को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें या तो प्रोडक्शन कम करना पड़ रहा है या फिर महंगी ऊर्जा का बोझ उठाना पड़ रहा है।
निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि गैस किल्लत का असर हर सेक्टर पर बराबर नहीं है। जो कंपनियां इंडस्ट्रियल, पावर या फर्टिलाइजर सेगमेंट पर ज्यादा निर्भर हैं, उनके मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, घरेलू गैस प्रोडक्शन में गिरावट एक लंबी अवधि की चिंता बनी हुई है, जिससे भारत पर महंगी अंतरराष्ट्रीय मार्केट की निर्भरता और बढ़ गई है। आने वाले समय में मिडिल ईस्ट के हालात और ग्लोबल प्राइस ट्रेंड्स ही यह तय करेंगे कि कंपनियां इस ऊर्जा संकट से कैसे निपटती हैं।
