7 साल की रुकावट के बाद फिर शुरू हुआ प्रोजेक्ट
भूटान के 1,200 MW Punatsangchhu-I हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य 10 अप्रैल, 2026 को फिर से शुरू हो गया है। यह प्रोजेक्ट 7 सालों से रुका हुआ था। भारतीय और भूटानी सरकारों के बीच ढलान को स्थिर (slope stabilization) करने को लेकर हुए समझौते के बाद यह फैसला लिया गया है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने पर भूटान की कुल बिजली उत्पादन क्षमता करीब 30% बढ़कर लगभग 4,700 MW हो जाएगी। उम्मीद है कि यह सालाना करीब 5,670 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन करेगा, जिसका अधिशेष (surplus) भारत को निर्यात किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट भारत के क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा (regional energy security) और क्लीन एनर्जी (clean energy) लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
लागत में भारी उछाल, देरी का चक्र जारी
यह प्रोजेक्ट नवंबर 2008 में शुरू हुआ था और इसे मूल रूप से 2016 तक पूरा होना था। हालांकि, भूवैज्ञानिक समस्याएं (geological issues), जैसे भूस्खलन (landslides) और दाहिने किनारे की ढलान का अस्थिर होना (right bank slope destabilization), इसके काम में बार-बार रुकावटें पैदा करते रहे। साल 2019 से प्रोजेक्ट रुका हुआ था। इन देरी के कारण प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत Nu 35 अरब से बढ़कर अब Nu 100 अरब (लगभग ₹8,785 करोड़) तक पहुँच गई है। फरवरी 2026 तक, प्रोजेक्ट की वित्तीय प्रगति स्वीकृत लागत का 93.7% और भौतिक प्रगति 87.75% तक पहुँच चुकी थी।
ऊर्जा के लिए अहम पार्टनरशिप
भारत इस प्रोजेक्ट का मुख्य फाइनेंसर (financier) है, जो 40% अनुदान (grant) और 60% लोन के रूप में पैसा दे रहा है, जिस पर 10% सालाना ब्याज (interest) दर है। Punatsangchhu-I प्रोजेक्ट दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग (energy cooperation) का एक अहम हिस्सा है। इससे भूटान के हाइड्रोपावर संसाधनों का विकास होता है, जो उसकी GDP और निर्यात आय का एक बड़ा ज़रिया है। भारत को अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy) लक्ष्यों के लिए साफ और भरोसेमंद ऊर्जा आयात (energy imports) मिलता है। यह प्रोजेक्ट भारत और भूटान के बीच ऐसे कई बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में से एक है, जिनमें Chukha, Tala और हाल ही में पूरा हुआ Punatsangchhu-II शामिल है, जिसने नवंबर 2025 से भारत को बिजली भेजना शुरू किया है।
क्षेत्रीय ऊर्जा लक्ष्यों में फिट
Punatsangchhu-I का फिर से शुरू होना दक्षिण एशिया, खासकर बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल (BBIN) क्षेत्र में ऊर्जा एकीकरण (energy integration) के एक बड़े चलन का हिस्सा है। देश तेजी से सीमा पार बिजली व्यापार (cross-border electricity trade) कर रहे हैं। भारत का लक्ष्य 2035-36 तक 900 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल (non-fossil fuel) क्षमता हासिल करना है, जिसके लिए ऊर्जा आयात महत्वपूर्ण है। जबकि हाइड्रोपावर भूटान का मुख्य ऊर्जा स्रोत है, देश मौसमी उत्पादन (seasonal generation) की समस्याओं को कम करने और बढ़ती घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए सोलर (solar) और विंड पावर (wind power) पर भी विचार कर रहा है।
बनी हुई हैं चिंताएं
भूवैज्ञानिक चुनौतियां अभी भी कायम
परियोजना के दोबारा शुरू होने के बावजूद, भूवैज्ञानिक समस्याएं अभी भी एक बड़ी चिंता का विषय हैं। दाहिने किनारे की ढलान 2013, 2016 और 2019 में खिसक चुकी है, जिसके लिए लगातार स्थिरीकरण (stabilization) की आवश्यकता है। पिछली समीक्षाओं से पता चला है कि प्रोजेक्ट में बड़े बदलावों, जैसे कि बांध स्थल का स्थानांतरण, में विशेषज्ञों की सलाह को पूरी तरह से शामिल नहीं किया गया होगा, जो देरी और लागत में वृद्धि का कारण बना। प्रोजेक्ट के पूरा होने की संशोधित अनुमानित तारीख 2029-2030 है, जो मूल 2016 के लक्ष्य से काफी बाद है, यह दर्शाता है कि देरी का खतरा अभी भी बना हुआ है।
भूटान पर कर्ज़ का बोझ
प्रोजेक्ट की लागत का अनुमान Nu 100 अरब तक पहुँचने से भूटान के वित्त (finances) पर भारी वित्तीय दबाव पड़ रहा है। हाइड्रोपावर का कर्ज़ (debt) पहले से ही भूटान के बाहरी कर्ज़ का लगभग 70% और GDP का 80% से अधिक है। इन लगातार हो रही देरी से देश की वित्तीय स्थिति पर दबाव और बढ़ गया है। भारत से 10% सालाना ब्याज दर पर मिला लोन भी फाइनेंसिंग लागत (financing costs) को बढ़ाता है। हालाँकि प्रोजेक्ट अधिकारियों का कहना है कि प्रति मेगावाट लागत प्रतिस्पर्धी (competitive) है, लेकिन जमा हुआ भारी कर्ज़ और अनिश्चित पूर्णता तिथि (completion date) पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।
आमदनी का अनुमान अनिश्चित
भविष्य की लाभप्रदता (profitability) के लिए एक महत्वपूर्ण कारक भारत को निर्यात की जाने वाली अतिरिक्त बिजली की कीमत (price) का निर्धारण है। समझौते के अनुसार, यह कीमत प्रोजेक्ट के चालू होने पर 'आपसी सहमति' से तय की जाएगी। इसका मतलब है कि भूटान की बिजली निर्यात से होने वाली आय भविष्य की बातचीत पर निर्भर करेगी, जिससे प्रोजेक्ट की आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) और अपेक्षित रिटर्न (expected returns) के बारे में अनिश्चितता बनी हुई है।
आगे क्या?
Punatsangchhu-I प्रोजेक्ट के अप्रैल 2026 में शुरू होने के 5 साल के भीतर पूरा होने की उम्मीद है, जिसका लक्ष्य 2029 या 2030 तक चालू होना है। इसकी सफलता शेष बांध निर्माण और ढलान स्थिरीकरण को पूरा करने, अनुकूल भूवैज्ञानिक परिस्थितियों और बिजली निर्यात कीमतों पर समय पर समझौते पर निर्भर करती है। अधिकारी आशावादी बने हुए हैं, लेकिन स्वीकार करते हैं कि समय-सीमा अभी भी अप्रत्याशित प्राकृतिक घटनाओं (unforeseen natural events) के प्रति संवेदनशील (vulnerable) है।