भारत से उन देशों को होने वाला फ्यूल एक्सपोर्ट **43%** बढ़कर **1 बिलियन यूरो** पहुंच गया है, जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं। Reliance Industries जैसी रिफाइनरी अब ग्लोबल रेगुलेशंस के बीच एक चुनौतीपूर्ण संतुलन बना रही हैं।
बदलता ट्रेड और रिस्क प्रोफाइल
सितंबर में भारत, तुर्की और ब्रुनेई से प्रोसेस्ड फ्यूल का एक्सपोर्ट 1 बिलियन यूरो के स्तर को छू गया है, जो अगस्त के मुकाबले 43% ज्यादा है। यह खेप यूरोपीय यूनियन (EU), ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे बाजारों में पहुंच रही है, जिससे ग्लोबल लेवल पर अनुपालन (Compliance) और रेगुलेटरी दबाव बढ़ गया है।
Reliance Industries और EU के नियम
Reliance Industries की जामनगर रिफाइनरी इस ट्रेड में सबसे बड़ी सप्लायर बनकर उभरी है। EU ने रूस के कच्चे तेल से बने फ्यूल पर बैन लगा रखा है, लेकिन 'नेट क्रूड एक्सपोर्टर्स' के लिए कुछ छूट दी गई हैं। इसके बावजूद, अब इस बात की मांग जोर पकड़ रही है कि रिफाइनरी लेवल पर सख्त चेकिंग की जाए ताकि रूसी तेल के अंश को पूरी तरह ब्लॉक किया जा सके।
रिफाइनरी की बदलती स्ट्रैटेजी
निवेशकों के लिए यह एक जटिल स्थिति है। भारतीय रिफाइनरी Urals ग्रेड के सस्ते कच्चे तेल का फायदा उठाती रही हैं, जो Brent क्रूड के मुकाबले 23 डॉलर तक सस्ता होता है। हालांकि, अब भारत का रूसी क्रूड इम्पोर्ट 13% गिर गया है। जामनगर ने अपना इम्पोर्ट 27% और पारादीप रिफाइनरी ने 21% घटाया है। इसके उलट, Nayara Energy की वाडिनार रिफाइनरी ने रूसी क्रूड का अपना मार्केट शेयर बढ़ाया है।
आगे क्या होगा?
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर वेस्टर्न देशों ने रेगुलेशंस और सख्त किए, तो रिफाइनरी मार्जिन्स पर सीधा असर पड़ सकता है। फिलहाल निवेशकों को EU के नए नियमों, कच्चे तेल के डिस्काउंट गैप और भारतीय कंपनियों की ओर से रशियन ऑयल पर कम होती निर्भरता पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
