भारत के फ्यूल एक्सपोर्ट रेवेन्यू में इस फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में शानदार बढ़त दिखी है। भले ही एक्सपोर्ट वॉल्यूम **16%** गिर गया हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल और रुपये की कमजोरी ने कमाई को **₹2.59 लाख करोड़** तक पहुंचा दिया है।
अप्रैल से सितंबर के बीच भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में एक अनोखी स्थिति देखने को मिली है। एक ओर जहां एक्सपोर्ट की जाने वाली मात्रा में 16% की गिरावट दर्ज की गई, वहीं एक्सपोर्ट रेवेन्यू साल-दर-साल 50% उछलकर ₹2.59 लाख करोड़ के आंकड़े पर पहुंच गया है। इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा हाथ इंटरनेशनल मार्केट में फ्यूल की ऊंची कीमतों और डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट का रहा है।
रुपये की चाल और डीजल की अहमियत
इस छमाही में रुपया औसतन 95.17 के स्तर पर रहा, जबकि पिछले साल यह 86.44 था। कमजोर रुपये ने एक्सपोर्ट की वैल्यू को बढ़ाने में बड़ी मदद की है। सबसे ज्यादा असर डीजल के मोर्चे पर दिखा, जिसका एक्सपोर्ट वॉल्यूम 19% घटने के बावजूद रेवेन्यू 58% बढ़कर ₹1.2 लाख करोड़ हो गया। वहीं, पेट्रोल का एक्सपोर्ट रेवेन्यू 21% बढ़कर ₹58,000 करोड़ रहा, जबकि इसकी मात्रा में 24% की गिरावट आई।
रिफाइनर्स के लिए क्या है चुनौती?
भारत का घरेलू बाजार अब ईंधन की खपत को लेकर और टाइट हो रहा है। पेट्रोल की खपत 5% और डीजल की खपत 7% बढ़ी है, जबकि रिफाइनिंग प्रोडक्शन स्थिर बना हुआ है। इसका सीधा असर Reliance Industries, Nayara Energy और Mangalore Refinery and Petrochemicals Limited (MRPL) जैसी कंपनियों पर पड़ेगा, जो अब अपनी सप्लाई को एक्सपोर्ट के बजाय घरेलू बाजार में प्राथमिकता दे रही हैं।
निवेशकों के लिए रिस्क फैक्टर
भारत अपनी 90% कच्चा तेल (Crude Oil) जरूरतें आयात करता है, जिससे यह सेक्टर ग्लोबल मार्केट में आने वाली उथल-पुथल के प्रति बहुत संवेदनशील है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या घरेलू मांग इसी तरह बढ़ती रही तो कंपनियों का एक्सपोर्ट कोटा कितना प्रभावित होगा। भविष्य में रिफाइनिंग मार्जिन पर नजर रखना सबसे जरूरी है, क्योंकि यही तय करेगा कि यह बढ़ी हुई कमाई आगे चलकर मजबूत प्रॉफिट में बदल पाएगी या नहीं।
