भारत सरकार अपनी नेशनल सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) पॉलिसी को अंतिम रूप दे रही है, ताकि 2027 से अंतरराष्ट्रीय कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा किया जा सके। इसके तहत टैक्स छूट और फंड मुहैया कराकर SAF और पारंपरिक जेट फ्यूल के बीच के बड़े प्राइस गैप को पाटने की तैयारी है।
CORSIA लक्ष्यों की तैयारी
भारत 1 जनवरी, 2027 से प्रभावी होने वाले 'कार्बन ऑफसेटिंग एंड रिडक्शन स्कीम फॉर इंटरनेशनल एविएशन' (CORSIA) के मैंडेट्स को पूरा करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। SAF की कीमत फिलहाल पारंपरिक जेट फ्यूल (ATF) से 2 से 6 गुना अधिक है। इस अंतर को कम करने के लिए सरकार GST और एक्साइज ड्यूटी में राहत के साथ-साथ 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' देने की योजना बना रही है।
ब्लेंडिंग के लक्ष्य और रोडमैप
सरकार ने फ्यूल में SAF की ब्लेंडिंग के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय किए हैं:
- 2027: 1% ब्लेंडिंग
- 2028: 2% ब्लेंडिंग
- 2030: 5% ब्लेंडिंग
उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले ही अक्टूबर 2026 में अपनी स्टेट-स्पेसिफिक पॉलिसी को मंजूरी देकर स्टैम्प ड्यूटी और ब्याज सब्सिडी जैसे प्रोत्साहन देने का रास्ता साफ कर दिया है।
रिफाइनरीज के लिए मौका, एयरलाइंस के लिए चुनौती
निवेशकों के नजरिए से, यह बदलाव मिला-जुला असर डालने वाला है। Indian Oil Corporation (IOCL), Bharat Petroleum (BPCL) और Hindustan Petroleum (HPCL) जैसी बड़ी कंपनियां रिफाइनरीज को अपग्रेड करने में मुख्य भूमिका निभाएंगी, जिसके लिए उन्हें सरकारी फंडिंग का सहारा मिलेगा। वहीं, IndiGo और Air India जैसी एयरलाइंस के लिए बढ़ती लागत एक चिंता का विषय बनी रहेगी। यदि सरकार की सब्सिडी पूरी तरह से फ्यूल कॉस्ट के प्रीमियम को कवर नहीं करती है, तो एयरलाइंस के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
एग्जीक्यूशन का रिस्क
सबसे बड़ा चैलेंज फीडस्टॉक (जैसे यूज्ड कुकिंग ऑयल) की सप्लाई चेन तैयार करना है। अभी तक इंडस्ट्री के पास इतने बड़े स्तर पर लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं है। निवेशकों को आने वाले समय में पॉलिसी की फाइनल डिटेल्स पर कड़ी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेगा कि यह प्रोजेक्ट कितना प्रॉफिटेबल साबित होगा।
