अमेरिका-ईरान विवाद के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सप्लाई बाधित हुई है। भारत और अन्य एशियाई बाजारों को अब महंगे स्पॉट-मार्केट से LNG खरीदनी पड़ रही है, जिससे देश पर **$7.4 बिलियन** का अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है और पावर सेक्टर पर दबाव बढ़ गया है।
घरेलू उद्योगों पर असर
भारत में नेचुरल गैस पर निर्भर उद्योगों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। सिटी गैस डिस्ट्रिब्यूशन, फर्टिलाइजर्स और गैस-आधारित पावर प्लांट चलाने वाली कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ रहा है। फ्यूल इम्पोर्ट की लागत में हुई इस तेज बढ़ोतरी के कारण कंपनियों को या तो अपना मार्जिन घटाना होगा, या फिर इसका बोझ आम ग्राहकों पर डालना होगा, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
सप्लाई चेन में अनिश्चितता के कारण नई परियोजनाओं की योजना पर भी ब्रेक लग गया है। कई कंपनियां अब गैस-फायर्ड पावर प्रोजेक्ट्स की व्यवहार्यता (feasibility) पर फिर से विचार कर रही हैं।
एनर्जी स्ट्रैटेजी में बदलाव
इस संकट से निपटने के लिए कई देश अपनी एनर्जी स्ट्रेटजी बदल रहे हैं। मिडिल ईस्ट की सप्लाई पर निर्भरता कम करने के लिए अब कोयले की तरफ वापसी हो रही है, तो वहीं दूसरी ओर सोलर और हाइड्रोइलेक्ट्रिक जैसे रिन्यूएबल एनर्जी सोर्सेज में निवेश तेज किया जा रहा है। आने वाले समय में एनर्जी और पावर सेक्टर की कंपनियों के लिए फ्यूल मिक्स और प्राइसिंग स्ट्रैटेजी में बदलाव करना ही मुनाफे को बचाने का एकमात्र रास्ता होगा।
